Monday, November 20, 2017

अबकी बार लौटा तो .......कुंवर नारायण सिंह


1927-2017
अबकी बार लौटा तो 
बृहत्तर लौटूंगा 
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं 
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं 
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को 
तरेर कर न देखूंगा उन्हें 
भूखी शेर-आँखों से 

अबकी बार लौटा तो 
मनुष्यतर लौटूंगा 
घर से निकलते 
सड़को पर चलते 
बसों पर चढ़ते 
ट्रेनें पकड़ते 
जगह बेजगह कुचला पड़ा 
पिद्दी-सा जानवर नहीं 

अगर बचा रहा तो 
कृतज्ञतर लौटूंगा 

अबकी बार लौटा तो 
हताहत नहीं 
सबके हिताहित को सोचता 
पूर्णतर लौटूंगा
- कुंवर नारायण सिंह



Sunday, November 19, 2017

अपलक देखती रही.....मोनिका जैन 'पंछी'

तुम्हें याद है वो दिन 
जब हम आखिरी बार मिले थे 
फिर कभी ना मिलने के लिए। 

तुम्हें क्या महसूस हुआ 
ये तो नहीं जानती 
पर जुदाई के आखिरी पलों में 
मैं बिल्कुल हैरान थी। 

कुछ ऐसा लग रहा था जैसे 
अलग कर दिया है मेरी रूह को 
मेरे ही जिस्म से 
दिल काँप रहा था मेरा 
इस अनचाही विदाई की रस्म से। 

एक अनजाने से खौफ ने 
जकड़ लिया था मुझे 
और तेरे आँखों से ओझल होने के बाद भी 
अपलक देखती रही मैं बस तुझे। 

- मोनिका जैन 'पंछी'

Saturday, November 18, 2017

नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ,,,,बाबा नागार्जुन

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा -
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वरना किसे नहीं भाँएगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

- बाबा नागार्जुन

Friday, November 17, 2017

दीवारों की सीलन…उफ़...गौतम राजरिशी

ठिठुरी रातें, पतला कम्बल, दीवारों की सीलन…उफ़
और दिसम्बर ज़ालिम उस पर फुंफकारे है सन-सन …उफ़

दरवाजे पर दस्तक देकर बात नहीं जब बन पायी
खिड़की की छोटी झिर्री से झाँके है अब सिहरन…उफ़

छत पर ठाठ से पसरा पाला शब भर खिच-खिच शोर करे
सुब्ह को नीचे आए फिसल कर, गीला-गीला आँगन…उफ़

बूढ़े सूरज की बरछी में जंग लगी है अरसे से
कुहरे की मुस्तैद जवानी जैसे सैनिक रोमन…उफ़

ठंढ के मारे सिकुड़े-सिकुड़े लोग चलें ऐसे जैसे
सिमटी-सिमटी शरमायी-सी नई-नवेली दुल्हन…उफ़

हाँफ रही है धूप दिनों से बादल में अटकी-फटकी
शोख़ हवा ऐ ! तू ही उसमें डाल ज़रा अब ईंधन…उफ़

जैकेट-मफ़लर पहने महलों की किलकारी सुन-सुन कर
चिथड़े में लिपटा झुग्गी का थर-थर काँपे बचपन…उफ़

पछुआ के ज़ुल्मी झोंके से पिछवाड़े वाला पीपल
सीटी मारे दोपहरी में जैसे रेल का इंजन…उफ़
(01955-213171, 9419029557)

Thursday, November 16, 2017

ज़िन्दगी उम्मीद पर...गुलाब जैन

ज़िन्दगी उम्मीद पर कब तक रहेगी,
काग़ज़ की कश्ती है कब तक बहेगी।

क्यूँ, किसने, क्या कहा, फ़िक्र न करें,
दुनिया तो कहती है, कहती रहेगी।

जलती है वो भी इश्क़ में उसके,
शमा परवाने को, ये कैसे कहेगी।

ख़िज़ां गर है आई, फ़िज़ा होगी पीछे,
दोनों की दौड़ ये, बदस्तूर रहेगी।

तसव्वुर में जैसी परवाज़ होगी,
बुलंदी आसमां की भी वैसी रहेगी।
- गुलाब जैन

Wednesday, November 15, 2017

सोच में सीलन बहुत है......सीमा अग्रवाल

सोच में सीलन बहुत है
सड़ रही है,
धूप तो दिखलाइये

है फ़क़त उनको ही डर
बीमारियों का
जिन्हें माफ़िक हैं नहीं
बदली हवाएँ
बंद हैं सब खिड़कियाँ
जिनके घरों की
जो नहीं सुन सके मौसम
की सदाएँ

लाज़मी ही था बदलना
जीर्ण गत का
लाख अब झुंझलाइए

जड़ अगर आहत हुआ है
चेतना से,
ग़ैरमुमकिन, चेतना भी
जड़ बनेगी
है बहुत अँधियार को डर
रोशनी से,
किंतु तय है रोशनी
यूँ ही रहेगी

क्यों भला भयभीत है पिंजरा
परों से
साफ़ तो बतलाइए

कीच से लिपटे हुए है
तर्क सारे
आप पर, माला बनाकर
जापते हैं
और ज्यादा नग्न
होते है इरादे
जब अनर्गल शब्द उन पर
ढाँकते हैं

हैं स्वयं दलदल कि दलदल
में धंसे हैं
गौर तो फरमाइए

- सीमा अग्रवाल
काव्यालय

Tuesday, November 14, 2017

किन धागों से सी लूँ बोलो.....श्वेता सिन्हा

मैं कौन खुशी जी लूँ बोलो।
किन अश्कों को पी लूँ बोलो।
बिखरे लम्हों की तुरपन को
किन धागों से सी लूँ बोलो।

पलपल हरपल इन श्वासों से
आहों का रिसता स्पंदन है,
भावों के उधड़े सीवन को,
किन धागों से सी लूँ बोलो।

हिय मुसकाना चाहे ही न
अधरों से झरे फिर कैसे खुशी,
पपड़ी दुखती है जख़्मों की,
किन धागों से सी लूँ बोलो।

मैं मना-मनाकर हार गयी
तुम निर्मोही पाषाण हुये,
हिय वसन हुए है तार तार,
किन धागों से सी लूँ बोलो

भर आये कंठ न गीत बने
जीवन फिर कैसे मीत बने,
टूटे सरगम की रागिनी को,
किन धागों से सी लूँ बोलो।