Friday, April 27, 2018

बालों पे चांदी सी चढ़ी थी.....निधि सिंघल

ज़िन्दगी से लम्हें चुरा
पर्स में रखती रही!

फुरसत से खरचूंगी
बस यही सोचती रही।

उधड़ती रही जेब
करती रही तुरपाई
फिसलती रही खुशियाँ
करती रही भरपाई।

इक दिन फुरसत पायी
सोचा .......
खुद को आज रिझाऊं
बरसों से जो जोड़े
वो लम्हें खर्च आऊं।

खोला पर्स..लम्हें न थे
जाने कहाँ रीत गए!

मैंने तो खर्चे नही
जाने कैसे बीत गए !!

फुरसत मिली थी सोचा
खुद से ही मिल आऊं।

आईने में देखा जो
पहचान ही न पाऊँ।

ध्यान से देखा बालों पे
चांदी सी चढ़ी थी,
थी तो मुझ जैसी
जाने कौन खड़ी थी।
-निधि सिंघल

Thursday, April 26, 2018

अस्तित्व..... और अस्मिता बचाने की लडाई......कुसुम कोठारी


अस्तित्व..... 
और अस्मिता बचाने की लडाई
खूब लडो जुझारू हो कर लड़ो
पर रुको 
सोचो ये सिर्फ 
अस्तित्व की लड़ाई है या 
चूकते जा रहे 
संस्कारों की प्रतिछाया... 

जब दीमक लगी हो नीव मे
फिर हवेली कैसे बच पायेगी 
नीव को खाते खाते
दिवारें हिल जायेगी
एक छोटी आंधी भी
वो इमारत गिरायगी
रंग रौगन खूब करलो
कहां वो बच पायेगी।

नीड़ तिनकों के तो सुना
ढहाती है आंधियां
घरौंदे माटी के भी 
तोडती है बारिशें
संस्कारों की जब
टूटती है डोरिया
उन कच्चे धागों पर कैसे
शामियाने  टिक पायेंगे।

समय ही क्या बदला है 
या हम भी हैं बदले बदले
नारी महान है माना
पर रावण, कंस भी पोषती है
सीता और द्रोपदी
क्या इस युग की बात है
काल चक्र मे सदा ही
विसंगतियां पनपती है।

पर अब तो दारुण दावानल है
जल रहा समाज जलता सदाचरण है
क्या होगा अंत गर ये शुरूआत है
केशव तो नही आयेंगे ये निश्चित है
कुछ  ढूंढना होगा इसी परिदृश्य मे 
अस्मिता का युद्ध स्वयं लड़ना होगा
संयम और संस्कारों को गढ़ना होगा।
 - कुसुम कोठारी

Wednesday, April 25, 2018

हाइकु.....नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”

(१)
तेज तपन,
बनी हूँ विरहन
जलता मन,
   
(२)
आखिरी आस
अब होगा मिलन
बुझेगी प्यास

(३)
फाल्गुनी रंग
चहुँ ओर गुलाबी
पीव न संग

(4)
रात  अँधेरी
मेंरा चाँद ओझल
उसी को हेरी

(5)
निगाहें फेरी,
या प्रेम छल अब,
है कौन बैरी ?

(6)
बरसें    नैन,
सुजान तुम कहाँ,
मिले न चैन,

(7)
खिलीं कलियाँ,
  सुगन्धित वसुधा,
नव प्रभात,

(8)
नवल राग,
आया है मधुमास,
खेलेंगे फाग,

(9)
कहता चंग,
करें मन गुलाबी
पी प्रेम भंग,

(10)
तपता तन,
  सजन सतरंगी,
रंग दो मन,
-नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”
श्रोत्रिय निवास बयाना

Tuesday, April 24, 2018

ढूँढती हूँ...अजन्ता शर्मा

उनको बिसारकर ढूँढती हूँ।
पहर-दर-पहर ढूँढती हूँ।

खाकर ज़हर ज़िन्दगी का,
शाम को, सहर ढूँढती हूँ।

अपने लफ्जों का गला घोंट,
उनमें असर ढूँढती हूँ।

अन्तिम पड़ाव पर आज,
अगला सफ़र ढूँढती हूँ।

बर्दाश्त की हद देखने को,
एक और कहर ढूँढती हूँ।

दीवारें न हों घरों के सिवा,
ऐसा एक शहर ढूँढती हूँ।

रंग बागों का जीवन में भरे,
फूलों का वो मंजर ढूँढती हूँ।

इश्क की रूह ज़िन्दा हो जहाँ,
ऐसी इक नज़र ढूँढती हूँ।

दिल को खुश करना चाहूँ,
वादों का नगर ढूँढती हूँ।

रौशनी आते आते टकरा गई,
सीधी - सी डगर ढूँढती हूँ।

छोड़ जाय मेरे आस का मोती,
किनारे खड़ी वो लहर ढूँढती हूँ।

जो मुझे डंसता है छूटते ही,
उसी के लिये ज़हर ढूँढती हूँ।

जानती हूँ कोई साथ नहीं देता।
क्या हुआ ! अगर ढूँढती हूँ।

कौन कहता है कि मै ज़िन्दा हूँ?
ज़िन्दगी ठहर ! ढूँढती हूँ!

पत्थर में भगवान बसते हैं,
मिलते नहीं, मगर ढूँढती हूँ।
-अजन्ता शर्मा

Monday, April 23, 2018

कोई अर्थ नहीं......राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर

नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं*।।

जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका -तिनका बन गिर जाये,
फिर होने वाली वर्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,
फिर सुख में उन सम्बन्धों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहाँ, 
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

मन कटुवाणी से आहत हो 
भीतर तक छलनी हो जाये,
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,
     फिर उन अगनित सुविधाओं का
रह जाता कोई अर्थ नहीं।।
-राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर

Sunday, April 22, 2018

जीवन के प्रति श्रद्धा...उर्मिला सिंह

दिल के  समन्दर  में भावों की  कश्ती  होती है!
उठती गिरती लहरें जीवन की कहानी कहती है!!
सुख दुख है जीवन माना ,पर पार उसे है करना,
सघर्षों से लड़ कर ही अपनी पहचान बनानी है!!

ज्ञान तुम्हें मिलता है किताबों से, सच है माना
अनुभव राह दिखाता है ,जब छाये घोर अँधेरा
जितने गहरे जाओगे मोती ढूंढ तभी पाओगे
जग में पदचिन्ह तभी तुम अपने दे जाओगे

जीवन के प्रति श्रद्धा ही ध्येय तुम्हें बनाना है
कर्म शक्ति सर्वदा तुम्हे, उसी से पाना है
यदि साध्य तुम्हारा उज्ज्वल होगा जीवन में
साधन अवश्य मिलेगा तुमको मन्जिल पाने में
-उर्मिला सिंह

Saturday, April 21, 2018

लघु कविताएँ ; ‘एक काफिला नन्हीं नौकाओं का’.....डॉ. सुधा गुप्ता

‘एक काफिला नन्हीं नौकाओं का’.....

1- सिर्फ़ एक धुन
उदासी में डूबी सुबह
उदासी में भीगी शाम
उदासी का जाम 
जिन्दगी की बाँसुरी पर 
सिर्फ़ एक धुन 
बजती हैं –
एSS क तेरा नाम ।
-0-
2- तपिश और आग 
दिल के आतिशदान में
चटख़ती यादों ! 
तपिश तो ठीक है, सही जाएगी 
उफ़ ! आग ऐसी ।
मत बनो बेरहम इतनी
मेरी दुनिया जल ही जाएगी !
-0-
3-दो पल में 
कहाँ- कहाँ हो आया मन
दो पला में
क्या- क्या पाया
खो आया मन 
दो पल में …
-0-
4- इंतज़ार 
इंतज़ार 
इंतज़ार ---
पलकों पर काँपते 
आँसुओं की बन्दनवार 
कि / पुतली की रोशनी में
झिलमिलाते /दीयों की क़तार ----
-0-
5-दस्तक
स्वीटपीज़ की गंध 
धीमे – धीमे/ हवा पर बैठ 
सरसराती/ आती हैं 
कोई महक भरी याद 
हौले –हौले 
मेरे दिल का दरवाज़ा 
थपथपाती हैं –
न, नहीं खोलूँगी !
-0-
6-फाँस 
बदल गया मौसम 
फूल गए
अमलतास 
करक गई / ज़ोर से 
फिर कोई फाँस…
-0-
7-चोट 
सुबह-सवेरे
कोयल बोली / कहाँ पी का गाँव
मौसम-बहेलिया 
मँजे खिलाड़ी-सा
फेंक गया दाँव 
टप से गिरी मैं 
चोट खाई चिड़िया-सी 
बाज़ी फिर
उसके हाथ रहेगी !!
-0-
8-मृग- जल 
हौले –से 
तुमने/ तपता मेरा हाथ 
छुआ, और पूछा -
‘अब कैसी हो?’
----झपकी आई थी !
-0-
9-सान्त्वना
फूल
मुझे बहलाने आए—
मेरे पास बैठ कर
हिचकी भर-भर 
रोने लगे …
-0-
10- सिसकी 
बहुत देर रो –रो कर
हलकान हो-हो कर 
सो जाए/ कोई बच्चा
काँधे लग कर 
तो/ नींद में 
जैसे बार- बार 
उसे सिस की आती है,
ऐसे 
मुझे तेरी याद आती है…।
-0-
11-बुज़दिल
दहकती टहनियाँ 
गुलमौर की 
‘आग किसने लगाई’ 
फुस फुसाया जा रहा है,
सवाल
जंगल में कई दिन से 
बुझाने
कोई आगे नहीं आता ।
-0-
12- औचक ही
गुज़रे सबेरों की 
किताब
का कोई पन्ना खुल गया
जनवरी की अलस्सुबह
ठण्डे पानी से नहा कर 
निकलने पर 
पूरी रफ्तार से / चलते
छत-पंखे के नीचे 
औचक ही 
आ गया तन –मन…
-0-
13-मिट्टी का दिया
मैं / मिट्टी का दीया
बड़ी मेहरबानी!
इस दीवाली
तुमने जला दिया
और / यूँ / अपना
जश्न मना लिया …
-डॉ. सुधा गुप्ता