Friday, January 20, 2017

जन्म लेती रहें बेटियां...स्मृति आदित्य

















मुझे अच्छी लगती है 
दूसरे या तीसरे नंबर की वे बेटियां 
जो बेटों के इंतजार में जन्म लेती है....
और जाने कितने बेटों को पीछे कर आगे बढ़ जाती है, 
बिना किसी से कोई उम्मीद या अपेक्षा किए
क्या कहीं किसी घर में 
बेटी के इंतजार में जन्मे 
बेटे कर पाते हैं यह कमाल....
अगर नहीं 
तो चाहती हूं कि 
हर बार बेटों के इंतजार में  
जन्म लेती रहें बेटियां...
पोंछ कर अपने चेहरे से 
छलकता तमाम 
अपराध बोध... 
आगे बढ़ती रहे बेटियां... 
बार-बार जन्म लेती रहे बेटियां...    

-स्मृति आदित्य 


Thursday, January 19, 2017

उलटी हो गई सब तदबीरें...........मीर तक़ी 'मीर'

1722 -1810 
उलटी हो गई सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहुत थे जागे सुबह हुई आराम किया

नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं, हमको अबस बदनाम किया

सारे रिन्दो-बाश जहाँ के तुझसे सजुद में रहते हैं
बाँके टेढ़े तिरछे तीखे सब का तुझको अमान किया

सरज़द हम से बे-अदबी तो वहशत में भी कम ही हुई
कोसों उस की ओर गए पर सज्दा हर हर गाम किया

किसका क़िबला कैसा काबा कौन हरम है क्या अहराम 
कूचे के उसके बाशिन्दों ने सबको यहीं से सलाम किया

ऐसे आहो-एहरम-ख़ुर्दा की वहशत खोनी मुश्किल थी
सिहर किया, ऐजाज़ किया, जिन लोगों ने तुझ को राम किया

याँ के सपेद-ओ-स्याह में हमको दख़ल जो है सो इतना है
रात को रो-रो सुबह किया, या दिन को ज्यों-त्यों शाम किया

सायदे-सीमीं दोनों उसके हाथ में लेकर छोड़ दिए
भूले उसके क़ौलो-क़सम पर हाय ख़याले-ख़ाम किया

ऐसे आहू-ए-रम ख़ुर्दा की वहशत खोनी मुश्किल है
सिह्र किया, ऐजाज़ किया, जिन लोगों ने तुझको राम किया

'मीर' के दीन-ओ-मज़हब का अब पूछते क्या हो उनने तो
क़श्क़ा खींचा दैर  में बैठा, कबका तर्क इस्लाम किया

-मीर तक़ी 'मीर'

तदबीरें : युक्तियाँ
तदबीरें : यौवन-काल
पीरी :वृद्धावस्था
मुख़्तारी : स्वतंत्रता
अबस : यूँ ही
रिन्दो-बाश : शराबी/ मवाली
सजुद में रहते हैं : तेरा सम्मान करते हैं
वहशत: पागलपन में
सायदे-सीमीं : चाँदी-सी बाहें
आहू-ए-रम ख़ुर्दा : ज़ख़्म खाए-हिरण
वहशत: पागलपन
राम : शांत
क़श्क़ा खींचा : तिलक लगाया
दैर : मंदिर
तर्क : छोड़

Wednesday, January 18, 2017

कद जितना भी भारी हो....अमरेन्द्र सुमन


हाकिम हो, चपरासी हो
नेता हो, व्यापारी हो
मंत्री हो, दरबारी हो
चाहे रंगरुट सिपाही हो। 

नर हो या फिर नारी हो
लम्बे बाल, दाढ़ी हो
आमद जिसकी गाढ़ी हो
कद जितना भी भारी हो। 

बनिया हो, मारवाड़ी हो
ब्राहमण हो या हाड़ी हो
सड़क हो या फांड़ी हो
सूट हो या फिर साड़ी हो। 

शासन में कड़ाई हो
आर-पार की लड़ाई हो
दुश्मन की सफाई हो
शासक की बढ़ाई हो। 

हो सीना चौड़ा सबका
चोरों की पिटाई हो
काले धन पर राजनीति की
सर्जिकल स्ट्राईक हो।

-अमरेन्द्र सुमन 
अनहद कृति से  

Tuesday, January 17, 2017

आंसुओं का बोझ..........मंजू मिश्रा


देखो...
तुम रोना मत 
मेरे घर की  दीवारें
कच्ची हैं 
तुम्हारे आंसुओं का बोझ 
ये सह नहीं पाएंगी 
-:-
वो तो
महलों की दीवारें होती हैं 
जो न जाने कैसे
अपने अंदर 
इतनी सिसकियाँ
समेटे रहती हैं और 
फिर भी
सर ऊंचा करके
खड़ी रहती हैं


Monday, January 16, 2017

मन उस पार पहुँच जाता है......डॉ. पूर्णिमा शर्मा



प्रेम बिना जीवन सूना है, प्रेम बिना जीवन नीरस है |
नहीं दिखाई पड़ता फिर भी कण कण रस से भर जाता है ||

किया प्रेम है जिसने उसको पतझर भी मधुमास है लगता 
नहीं वसंती पुष्प खिले हों, फिर भी राग वसन्त है जगता |
नहीं बहे मलयानिल फिर भी मन का बिरवा हुलसाता है 
जग का कण कण झूम झूम कर राग बहार सुना जाता है ||

नहीं कोई जो तार छेड़ कर वीणा को मुखरित कर जाए 
अन्तरतम में फिर भी मीठा राग कहीं से बज उठता है |
नहीं किसी की पायल झनकी, नहीं किसी के कँगना खनके 
इसी मौन में अनदेखा सा नृत्य कहीं पर हो जाता है ||

बिना किसी का हाथ लगे ही मन रोमांचित हो उठता है 
और अदृश्य बना सपनों में कोई गले लगा जाता है |
नहीं पास है आता कोई किन्तु पैठ जाता है मन में 
प्रेमपगा मन अनजाने ही अद्भुत रास रचा जाता है ||

किसी लोक से कोई किरण आ मन को आलोकित कर देती 
और अदृश्य वंशी की धुन फिर कोई अलौकिक राग सुनाती |
उड़ जाता मन, दूर क्षितिज में इन्द्रधनुष से रंग उभरते 
और उसी ज्योतित पथ पर चल मन उस पार पहुँच जाता है ||

-डॉ. पूर्णिमा शर्मा
गूगल + से

Sunday, January 15, 2017

उस पार का जीवन... सुशील कुमार शर्मा

मृत्यु के उस पार
क्या है एक और जीवन आधार 
या घटाटोप अंधकार।  

तीव्र आत्मप्रकाश
या क्षुब्ध अमित प्यास।   

शरीर से निकलती चेतना 
या मौत-सी मर्मांतक वेदना 
एक पल है मिलन का 
या सदियों की विरह यातना।  

भाव के भंवर में डूबता होगा मन 
या स्थिर शांत कर्मणा 
दौड़ता-धूपता जीवन होगा 
या शुद्ध साक्षी संकल्पना।

प्रेम का उल्लास अमित 
या विरह की निर्निमेष वेदना
रात्रि का घुटुप तिमिर है 
या हरदम प्रकाशित प्रार्थना।

है शरीर का कोई विकल्प
या है निर्विकार आत्मा
है वहां भी सुख-दु:ख का संताप 
या परम शांति की स्थापना।

है वहां भी पाप-पुण्य का प्रसार 
या निर्द्वंद्व अंतस की कामना 
होता होगा रिश्तों का रिसाव 
या शाश्वत प्रेम की भावना। 

-सुशील कुमार शर्मा

Saturday, January 14, 2017

ये तेरी आँखें है बोलती..... 'यासिर'


हर बयानी खलिशे-खार की तरह बयां होती 
खल्वत मे सफे-मिज़गा के मोअजे -शरोदगी है खोलती 

हनोज़ न मिल सका जवाब उन आँखों को 
मेरी रुकाशी मे न जाने कैसे -कैसे मुज़मर के साथ है डोलती 

मुश्ताक है सारी बातों को जानने के लिए 
हर नाश-औ-नुमा बात के शर-हे को जिबस है तोलती 

महवे रहती है दवाम मोअजे-ज़ार की कुल्फत मे 
ऐ-'यासिर' खामोश होकर भी ये तेरी आँखें है बोलती 

-श़ायर ज़नाब 'यासिर'
प्रस्तुतिः सिकंदर ख़ान


खार -- कांटे,  खल्वत-- तन्हाई, मिज़गा -- जूनून
शर-हे -- मतलब,  जिबस -- बहुत ज्यादा,   दवाम -- लीन