Tuesday, February 21, 2017

‘वो जो है ख़्वाब सा…......सय्यदैन ज़ैदी ’













वो जो है ख्वाब सा
ख़याल सा
धड़कन सा
सिरहन सा
सोंधी खुशबू सा
नर्म हवाओं सा
सर्द झोकों सा
मद्धम सी रौशनी सा
लहराती सी बर्क़ सा
बिस्तर की सिलवटों सा
बाहों में लिपटे तकिए सा
जिस्म की बेतरतीब चादर सा
सुबहों की ख़ुमारी सा
शाम की बेक़रारी सा
सरकती सी रात सा
ठहरी सी दोपहर सा
काश कभी मिल जाए
वहां उस ओट के पीछे
भींगते पीपल के नीचे
कुछ सूखा सा
कुछ कुछ गीला सा
बस जरा सा...
इतना सा...
-सय्यदैन ज़ैदी 


Monday, February 20, 2017

हमेशा ही रहेगा फायदे में....अज्ञात


चला इक दिन जो घर से पान खा कर 
तो थूका रेल की खिड़की से आकर

मगर जोशे हवा से चंद छींटे 
पड़े रुखसार पे इक नाजनीन के

हुई आपे से वो फ़ौरन ही बाहर
लगी कहने अबे ओ खुश्क बन्दर

ज़बान को रख तू मुंह के दाएरे में 
हमेशा ही रहेगा फायदे में

बहाने पान के मत छेड़ ऐसे 
यही अच्छा है मुझ से दूर रह ले 

तेरी सूरत तो है शोराफा के जैसी 
तबियत है मगर मक्कार वहशी 

कहा मैं ने कहानी कुछ भी बुन लें 
मगर मोहतरमा मेरी बात सुन लें

खुदा के वास्ते कुछ खौफ खाएं 
ज़रा सी बात इतनी न बढ़ाएं

नहीं अच्छा है इतना पछताना 
मुझे बस एक मौका देदो जाना

ज़बान को अपनी खुद से काट लूँगा
जहां थूका है उस को चाट लूंगा

शाय़र : अज्ञात

रुखसार : गाल , शोराफा : शरीफों

Sunday, February 19, 2017

हाँ मैं प्रवासी हूँ …मंजू मिश्रा


हाँ 
मैं प्रवासी हूँ 
शायद इसी लिए
जानता हूँ
कि मेरे देश की
माटी में
उगते हैं रिश्ते 
*
बढ़ते हैं
प्यार की धूप में
जिन्हें बाँध कर
हम साथ ले जाते हैं
धरोहर की तरह
और पोसते हैं उनको
कलेजे से लगाकर 
*
क्योंकि घर के बाहर
हमें धन, वैभव,
यश और सम्मान
सब मिलता है,
नहीं मिलती तो
रिश्तों की
वो गुड़ सी मिठास
जो अनगढ़ भले ही हो
लेकिन होती
बहुत अनमोल है 
*
हाँ मैं प्रवासी हूँ
-मंजू मिश्रा

Saturday, February 18, 2017

बादशाह पर जुर्माना...डॉ. रश्मि शील

एक बार रात्रि के समय बादशाह औरंगज़ेब सोने ही जा रहे थे कि शाही घंटी बज उठी। बादशाह शयनकक्ष से बाहर आये। उन्हें एक दासी आती दिखाई दी। वह बोली, ''हुज़ूरे आलम! क़ाज़ी साहब आलमपनाह से मिलने के लिए दीवान खाने में तशरीफ़ लाये हैं और आपका इन्तज़ार कर रहे हैं।"
औरंगज़ेब फ़ौरन दीवानखाने पहुँचे। क़ाज़ी ने उन्हें बताया, "जहांपनाह, गुजरात जिले के अहमदाबाद शहर के एक मुहम्मद मोहसीन ने उन पर पाँच लाख रुपयों का दावा ठोंका है। अतः कल आपको दरबार में हाज़िर होना होगा।" क़ाज़ी के चले जाने पर औरंगज़ेब विचार करने लगा कि उसने तो किसी से पाँच लाख रुपए उधार नहीं लिए हैं। स्मरण करने पर भी उसे याद नहीं आया। इतना ही नहीं, मुहम्मद मोहसीन नामक व्यक्ति को भी वह न पहचानता था।
दूसरे दिन दरबार लगा और मुज़रिम के रूप में औरंगज़ेब हाज़िर हुआ। सारा दरबार खचाखच भरा हुआ था और तिल रखने को भी जगह न थी। औरंगज़ेब को उसके जुर्म का ब्यौरा पढ़कर सुनाया गया।
बात यह थी कि औरंगज़ेब के भाई मुराद को गुजरात जिला सौंपा गया था। शाहजहां जब बीमार पड़ा तो उसने स्वयं को ही गुजरात का शासक घोषित कर दिया। उसे स्वयं के नाम के सिक्के जारी करने के लिए धन की ज़रूरत हुई तब उसने मुहम्मद मोहसीन से पाँच लाख रुपए उधार लिए थे। इस बीच औरंगज़ेब ने हिकमत करके शाहजहां को क़ैद कर लिया तथा अपने तीनो भाइयों- मुराद, दारा और शुजा को क़त्ल कर उन तीनो की संपत्ति अपने ख़ज़ाने में जमा कर ली। इस तरह मोहसीन से लिया गया धन भी उसके ख़ज़ाने में जमा हो गया।
औरंगज़ेब ने अपने अपराध के प्रति अनभिज्ञता ज़ाहिर की। मोहसीन ने अपने पास मौज़ूद दस्तावेज़ दिखाया। औरंगज़ेब ने जुर्म क़ुबूल कर लिया और शाही ख़ज़ाने से पाँच लाख रुपए निकलवा कर जुर्माना अदा किया।


-डॉ. रश्मि शील

Friday, February 17, 2017

और क्या चाहिये बसर के लिये.........ऋतु कौशिक

चल पड़े हम उसी सफ़र के लिये
वो ही मंज़िल उसी डगर के लिये

जिसके साये में मिट गई थी थकन
मैं हूँ बेताब उसी शजर के लिये

चंद रिश्ते दिलों के थोड़ी ख़ुशी 
और क्या चाहिये बसर के लिये

पक के गिरने की राह देखी सदा
पास पत्थर तो था समर के लिये

हर जगह रोशनी हुई है मगर
शब अँधेरी है खँडहर के लिये।


-ऋतु कौशिक

ritukaushiktanu@gmail.com

Thursday, February 16, 2017

मग़रूर तेरी राहें.....मनजीत कौर


मग़रूर तेरी राहें
किस तौर फिर निबाहें

मशगूल तुम हुए हो
महरूम मेरी चाहें

तुम पास गर जो होते
महफूज़ थीं फ़िज़ाएँ

किससे गिला करें अब
मायूस मेरी आहें

बदली है चाह इनमें
मख़्मूर जो निगाहें

तुम जो जुदा हुए हो
महदूद मेरी राहें

टूटा हुआ ये दिल है
तस्की इसे दिलाएँ।

-मनजीत कौर

Wednesday, February 15, 2017

Conversion of Rice straw into houses

आज कोई कविता नहीं पर एक वीडियो शेयर करना चाहती हूँ
जिसमें यह बताया गया है कि
धान के पौधे से धान अलग करने के पश्चात
जो पैरा बचता है वह अपने यहाँ पशु आहार के रूप में उपयोग में लाते है
पर विदेशों में इसका उपयोग कुछ इस तरह से किया जाता है
कृपया देखें...

Conversion of Rice straw into houses