Monday, January 22, 2018

इक न इक दिन.......निर्मल सिद्धू

इक न इक दिन जनाब बदलेंगे
जब होगा, बेहिसाब बदलेंगे

यादे माज़ी जो मुस्कुरायेगा
दिल के सारे जवाब बदलेंगे

ख़ौफ़ अपनों का डर ज़माने का
झूठे उनके नक़ाब बदलेंगे

दिल में डर काँटों का लगा पलने
हाथों के अब गुलाब बदलेंगे

कौन जीता वक़्त से निर्मल यां
जो बने हैं नवाब बदलेंगे
-निर्मल सिद्धू

Sunday, January 21, 2018

आपसे जब दोस्ती होने लगी.....’गुमनाम’ पिथौरागढ़ी


आपसे जब दोस्ती होने लगी
हाँ ग़मों में अब कमी होने लगी

रोज़ की ये दौड़ रोटी के लिए
भूख के घर खलबली होने लगी

आप मेरे हम सफ़र जब से हुए
ज़िन्दगी मेरी भली होने होने लगी

रख दिए कागज़ में सारे ज़ख्म जब
सूख के वो शायरी होने लगी

शहर भर में ज़िक्र है इस बात का
पीर की चादर बड़ी होने लगी

फूल तितली चिड़िया बेटी के बिना
कैसे ये दुनिया भली होने लगी

सर्द दुपहर उम्र की है साथ में
याद स्वेटर ऊनी सी होने लगी

सीख देता है नई वो इसलिए
हर नए ग़म से ख़ुशी होने लगी

ज़ख्म अब कहने लगे 'गुमनाम' जी
आपसे अब दोस्ती होने लगी
-’गुमनाम’ पिथौरागढ़ी
(नवीन विश्वकर्मा)

Saturday, January 20, 2018

बोसा या पान.....डॉ. मुफज़्ज़ल ज़ुल्फेक़ार

हीरा बना के दिल को उसमें देनी जान है
वरना तो क्या है ज़िन्दगी कोयले की खान है

चाँद सी सूरत को ही आना है उतर कर
तारे सा मैंने दिल पे बनाया निशान है

शीरीं है, बू-ए-गुल है जो छोड़े है लाल रंग
बोसा है या गुलकंद से भरा मीठा पान है

लाता है तबस्सुम अगर चहरे पे चार चाँद
ग्रहण वहीं लग जाता जब चलती ज़बान है

लेने खड़े हैं ना जाने कितने ही खरीदार
दर तेरा हसीना है या दिल की दुकान है

मुश्क़िल बता के इश्क़ को गुमराह कर रखा
जीतेजी है मरना कहो कितना आसान है

माशूक़ की बाहों में निकले दम वो सच्चा इश्क़
सरहद पे वतन की खड़ा कहता जवान है

मौत होती पहले, ज़िन्दगी फिर ‘मुफज़्ज़ल’
ख़ौफ़ में जी-जी के दी कितनों ने जान है !!
-डॉ. मुफज़्ज़ल ज़ुल्फेक़ार

Friday, January 19, 2018

कोशिशें मिट गईं दर्द मिटता नहीं....पावनी दीक्षित "जानिब"


आप की बात दिल पर असर कर गई 
हां लड़खड़ाई जुबां आंख भी भर गई।

कब कहां आपने हमको अपना कहा
कब कहां आपने हांथ थामा मेंरा
एक तरफा मोहब्बत तडपती रही
बस मैं ज़िंदा रही ज़िंदगी मर गई।

आप की बात दिल पर असर कर गई 
हां लड़खड़ाई जुबां आंख भी भर गई।

दिल में कांटे चुभे ज़ख़्म दिखता नही
कोशिशें मिट गईं दर्द मिटता नहीं
अब ये जाना के चाहत बुरी चीज़ है
ज़िंदगी मौत से बेख़बर कर गई।

आप की बात दिल पर असर कर गई 
लड़खड़ाए कदम आंख भी भर गई।

किसी उम्मीद से न मिला तू नज़र 
अब जुदा है हमारा तुम्हारा सफ़र
दर्द चाहत में मिलना तो दस्तूर है
आह दिल की ये जानिब खबर कर गई।

आप की बात दिल पर असर कर गई 
लड़खड़ाए कदम आंख भी भर गई।

पावनी दीक्षित "जानिब" 
सीतापुर

Thursday, January 18, 2018

सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं.....कुसुम कोठारी

जो फूलों सी जिंदगी जीते कांटे हजार लिये बैठे हैं
दिल मे फरेब और होटो पे झूठी मुस्कान लिये बैठे हैं। 

खुला आसमां ऊपर,ख्वाबों के महल लिये बैठें हैं
कुछ, टूटते अरमानो का ताजमहल लिये बैठें हैं। 

सफेद दामन वाले भी दिल दागदार लिये बैठे हैं
क्या लें दर्द किसी का कोई अपने हजार लिये बैठें हैं। 

हंसते हुए चहरे वाले दिल लहुलुहान लिये बैठे हैं
एक भी जवाब नही, सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं। 

टूटी कश्ती वाले हौसलों की पतवार लिये बैठे हैं
डूबने से डरने वाले साहिल पर नाव लिये बैठे हैं।
-कुसुम कोठारी


Wednesday, January 17, 2018

इन शब्दों ने हमें असहाय किया....निधि सक्सेना


कितना अच्छा होता अगर शब्द न होते
शब्दकोश न होते
उनके निहित अर्थ न होते!!

भावनाओं के पैरहन मात्र हैं शब्द
केवल ध्वनियाँ हैं
शोर हैं
जो दूसरे के ध्यान के आधीन है
उनकी समझ पर आश्रित हैं!!

हम जितना अपने भावों को शब्दों में लपेट पाते हैं
सामने वाला केवल उतना ही समझ पाता है!

इन शब्दों ने हमें असहाय किया
कि हम अबोला पढ़ सकें
मौन सुन सकें
मन के उद्गारों को महसूस कर सकें!

जैसे नेत्रहीन विकसित कर लेता है 
हाथों का स्पर्श और आहटें देखना
और देख पाता है बिना देखे!!
बधिर विकसित कर लेता है 
अधरों के कंपन
और आँखो के उद्बोधन सुनना
और सुन पाता है बग़ैर सुने
वैसे ही बगैर शब्द 
निसंदेह हम भी 
अधिक सक्षम होते!!
विकसित कर ही लेते
मन का पढ़ना
मौन समझना!!

~निधि सक्सेना

Tuesday, January 16, 2018

इस वक्त की ज़ंजीर में हैं......पावनी दीक्षित जानिब

इस वक्त की ज़ंजीर में हैं सब बंधे हुए 
खुदके बिछाए जाल में खुद ही फंसे हुए।

अपनी जुवां से आज हर कोई मुक़र गया
दिल की दिलों में खांईंयां है सब धंसे हुए ।

इश्क़ की गलियों से बेदाग निकल जाना
मुमकिन नहीँ दामन मिलें बिना रंगे हुए।

न होशियार बन इस शहर ए मोहब्बत में
फंसते है दिल की क़ैद शिकारी मंझे हुए।

दिल कह रहा है आज तमाशा बना मेंरा 
मुद्दत हुई है हमको खुलकर कर हंसे हुए।

कुछ कद्र कर हमारी जानिब ख़याल कर
हां हम हैं दुआ के जैसे यूं रब से मंगे हुए।
-पावनी दीक्षित जानिब