Monday, May 28, 2018

ये कैसा संगीत रहा है....ललित कुमार

मैं बीत रहा हूँ प्रतिपल
मेरा जीवन बीत रहा है
पल-पल के रिसते जाने से
जीवन-पात्र रीत रहा है
उसको पाने की ख़ातिर तो
खुद से भी मैं बिछड़ चुका हूँ
मिला नहीं क्यों अब तक मुझको
जो मेरा मनमीत रहा है

पता नहीं खुशी का अंकुर
कब झाँकेगा बाहर इससे
विश्वास का माली बरसों से
मन-भूमि को सींच रहा है

उठे दर्द की तरंगो-सा
गिरे ज्यों आँसू की हो बूँद
मेरे जीवन-वाद्य पर बजता
ये कैसा संगीत रहा है!

विजेता मेरे हृदय की तुम
उल्लास में पर ये ना भूलो
कोई हृदय को हार रहा है
तभी तो कोई जीत रहा है

समझा नहीं पाया तुमसे
कितना प्यार रहा है मुझको
नाम तुम्हारा ही पुकारता
मेरा हर इक गीत रहा है

मैं बीत रहा हूँ प्रतिपल
मेरा जीवन बीत रहा है…
-ललित कुमार

Sunday, May 27, 2018

सोचिये अगली सदी को देंगे क्या....रवीन्द्र प्रभात

कांच के जज्बात, हिम्मत कांच की
यार ये कैसी है इज्जत कांच की ?

पालते हैं खोखले आदर्श हम-
माँगते हैं लोग मन्नत कांच की

पत्थरों के शहर में महफूज़ है-
देखिये अपनी भी किस्मत कांच की

चुभ गया आँखों में मंजर कांच का-
दब गयी पाने की हसरत कांच की

सोचिये अगली सदी को देंगे क्या
रंगीनियाँ या कोई जन्नत कांच की ?
- रवीन्द्र प्रभात  

Saturday, May 26, 2018

अगन बरसती आसमां से....कुसुम कोठारी

अगन बरसती आसमां से जाने क्या क्या झुलसेगा
ज़मीं तो ज़मीं खुद तपिश से आसमां भी झुलसेगा

जा ओ जेठ मास समंदर में एक दो डुबकी लगा
जिस्म तेरा काला हुवा खुद तू भी अब झुलसेगा

ओढ़ के ओढ़नी रेत की  पसरेगा तू बता कहां 
यूं बेदर्दी से जलता रहा तो सारा संसार झुलसेगा

देख आ एक बार किसानों की जलती आंखों में
उजड़ी हुई फसल में उनका सारा जहाँ झुलसेगा

प्यासे पाखी प्यासी धरती प्यासे मूक पशु बेबस
सूरज दावानल बरसाता तपिश से चांद झुलसेगा 

ना इतरा अपनी जेष्ठता पर समय का दास है तू
घिर आई सावन घटाऐं फिर भूत बन तू झुलसेगा।
 -कुसुम कोठारी


Friday, May 25, 2018

चकल्लस...लक्ष्मीनारायण गुप्त

कभी सोचता हूँ
यह सारी चकल्लस
छोड़के दुनिया से
संन्यास ले लूँ

लेकिन क्या इससे
कोई फरक पड़ेगा
संन्यासी अपनी पुरानी
अस्मिता को नकार देता है
अपना ही श्राद्ध कर देता है

लेकिन फिर नया नाम लेता है
नई अस्मिता शुरू करता है
और वही मुसीबतें
वही चकल्लस फिर 
शुरू हो जाती हैं

पहले लाला सोहनलाल को
अपनी दूकान चलानी होती थी
अब सोहनानंद भारती को
अपना आश्रम चलाना होता है

जब तक ज़िन्दगी है
तब तक चकल्लस भी है
इस लिए जो भी कर रहे हो
करते रहो, करते रहो


-लक्ष्मीनारायण गुप्त
—-२२ मई, २०१८

Thursday, May 24, 2018

जेठ की तपिश.....श्वेता सिन्हा

चित्र:-मनस्वी प्रांजल


त्रिलोकी के नेत्र खुले जब
अवनि अग्निकुंड बन जाती 
वृक्ष सिकुड़कर छाँह को तरसे
नभ कंटक किरणें बरसाती
बदरी बरखा को ललचाती  
जब जेठ की तपिश तपाती 

उमस से प्राण उबलता पल-पल
लू की लक-लक दिल लहकाती
मन के ठूँठ डालों पर झूमकर 
स्मृतियाँ विहृ्वल कर जाती 
पीड़ा दुपहरी कहराती 
जब जेठ की तपिश तपाती 

प्यासी  नदियां,निर्जन गुमसुम
घूँट-घूँँट जल आस लगाए
चिचियाए खग व्याकुल चीं-चीं
पवन झकोरे  आग लगाए
कलियाँ दिनभर में मुरझाती 
जब जेठ की तपिश तपाती 
  
   #श्वेता सिन्हा

Wednesday, May 23, 2018

मुझे बचपन की कुछ यादें.....रईस अमरोहवीं



तिरा ख़याल कि ख़वाबों में जिन से है ख़ुशबू 
वो ख़्वाब जिन में मिरा पैकर-ए-ख़याल है तू। 

सता रही हैं मुझे बचपन की कुछ यादें
वो गर्मियों के शब़-ओ-रोज़ दोपहर की वो लू। 

पचास साल की यादों के नक़्श और नक़्शे 
वो कोई निस्फ़ सदी क़ब्ल का ज़माना-ए-हू। 

वो गर्म-ओ-ख़ुश्क महीने वो जेठ वो बैसाख.
कि हाफ़िज़ में कभी आह कैं कभी आँसूं।
-रईस अमरोहवीं
मोहतरिम श़ायर रईस साहब की पूरी ग़ज़ल
पढ़वाना चाहते थे हम..
पर टाईप करने में असफल रहे
पूरी ग़ज़ल यहाँ पढ़ें
रोमन हिन्दी में है..


Tuesday, May 22, 2018

रेगिस्तानी प्यास......गीतकार जानकीप्रसाद 'विवश'

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आज भुनने लगी अधर है , 
रेगिस्तानी प्यास।

रोम रोम में लगता जैसे , 
सुलगे कई अलाव ।
मन को , टूक टूक करते,
ठंडक के सुखद छलाव ।

पंख कटा धीरज का पंछी ,
लगता बहुत उदास।

महासमर का दृश्य ला रही है,
शैतान लपट ।
धूप, चील जैसी छाया पर ,
प्रति पल रही झपट ।

कर वसंत को याद बगीचा,
...देखे महाविनाश।

सबको आत्मसमर्पित पा कर ,
सूरज शेर हुआ ।
आतप , भीतर छिपे सभी ,
कैसा अंधेर हुआ ।

परिवर्तन की आशा जब तक,
होना नहीं निराश।

बाढ़ थमेगी तभी ग्रीष्म की , 
पावस जब आये ।
लू -लपटों की भारी गर्मी , 
तब मुँह की खाए ।

अनुपम धैर्य प्रकृति का लख ,
मौसम कहता शाबाश ।

  सर्वाधिकार - गीतकार जानकीप्रसाद 'विवश '