Sunday, April 30, 2017

नीन गायब निदान गायब बा.....नूर मुहम्मद ‘नूर’

भोर गायब, बिहान गायब बा
रोसनी के निसान,, गायब  बा

का कहीं देस के खबर तो से
देंह भर बा, परान गायब बा

नवका साहेब के एजेंडा से
खेत गायब, किसान गायब बा

जिल्द भर रह गइल बा हाथे में
बीच से संविधान गायब बा

ई जे लउकत बा, इंडिया ह इ
अउर हिंदोस्तान  गायब बा

खांसि के टिमटिमा रहल बा दीया
नीन गायब निदान गायब बा।

Saturday, April 29, 2017

मेरे वास्ते जागीर इश्क़ है.....अजमेर अंसारी ‘कशिश’

पस्ती में जिसने माना के तदबीर इश्क़ है
पहुँचा बुलन्दियों पे तो तक़दीर इश्क़ है !

क्यों देखूँ इस जहान कीं रंगीनियाँ तमाम
मेरी नज़र में यार की तस्वीर इश्क़ है

हर लम्हा आता--जाता बताता है दोस्तो
दुनिया है एक ख़्वाब तो ताबीर इश्क़ है

मुझ सा कोई गनी नहीं सारे जहान में
आशिक़ हूँ मेरे वास्ते जागीर इश्क़ है

मिलकर न तोड़ पायेगीं दुनिया की ताकतें
हम आशिकों के पाँव की जंज़ीर इश्क़ है

महका ज़ख़म तो हो गया अहसास ये मुझे
जो दिल के आर-पार है वो तीर इश्क़ है

कुछ इस तरह अयाँ हुआ मुझपे ये फ़लसफ़ा
दामन पे टपका आँख से जो नीर इश्क़ है

मन्ज़िल हमारे पाँव की ठोकर में आयेगी
ग़र ज़िन्दगी की राह का रहगीर इश्क़ है

ये है सुबूत मेरी वफ़ाओं का ऐ "कशिश"
खूँ--खेज़ मेरी नज़रों में शमशीर इश्क़ है




Friday, April 28, 2017

शमशीर हाथ में हो....गंगाधर शर्मा "हिन्दुस्तान"

शमशीर हाथ में हो ओ तमाम तक न पहुँचे।
बुजदिल बड़ी सियासत जो नियाम तक न पहुँचे॥


सतसंग की परीक्षा जिस ने भी पास कर ली।
मुमकिन नहीं कि फिर वो घनश्याम तक न पहुँचे॥

शिकवा करूँ मैं कैसे कि जवाब क्यों न आया।
गुमनाम सारे ख़त थे गुलफ़ाम तक न पहुँचे॥


अब रोक दे ओ मालिक सब गर्दिशें ख़ला की।
ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे॥

जब ओखली में पूरा सर ही फँसा दिया तो।
मुगदर से क्यों कहें कि अंजाम तक न पहुँचे॥

"हिन्दोस्तां" भी या रब कब तक बचा सकेगा।
जो ये तार तार खेमे ख़य्याम तक न पहुँचे॥
-गंगाधर शर्मा "हिन्दुस्तान"

नियाम = म्यान, गुलफ़ाम =फूल का रंग

Thursday, April 27, 2017

वही रिश्ता प्यासा तिश्नगी से.....नूर मुहम्मद 'नूर'

हवा से, रोशनी से, ज़िन्दगी से
मैं आजिज आ न जाऊं शायरी से

भरोसा तोड़ता फिरता हूं सबका
मैं क्या बोलूं अपने आदमी से

मैं सहरा से ज्यादा कुछ कहां था
वही रिश्ता प्यासा तिश्नगी से

यही काम आएगी ऐ नूर भाई
भरोसा हो चला है तिरगी से

ये दुनियां और उसकी दुनियादारी
फकत देखा करूं बस बेबसी से

- नूर मुहम्मद 'नूर' 

Wednesday, April 26, 2017

क्या हादसा ये अजब हो गया.....महेश चन्द्र गुप्त ‘ख़लिश’


क्या हादसा ये अजब हो गया 
बूढ़े हुए, इश्क़ रब हो गया

चाहत का पैग़ाम तब है मिला 
पूरा सभी शौक जब हो गया 

हम आ गए ज़ुल्फ़ की क़ैद में
मिलना ही उनसे गजब हो गया 

रहते थे हमसे बहुत दूर वो 
मिलने का ये शौक कब हो गया 

हमको मिला ना ख़ुदा, ना सनम 
पूरा ख़लिश वक़्त अब हो गया.

-महेश चन्द्र गुप्त ‘ख़लिश’

Tuesday, April 25, 2017

बहुत दिन हो गए!....एमएल मोदी (नाना)










जब करते थे यारों के बीच ठिठौली
वो वक्त गुजरे बहुत दिन हो गए!

किसी अपने को तलाश करते हुए,
एक अनजान शहर में आए-
बहुत दिन हो गए!  

न मंजिल का पता है और न ही रास्ते की खबर,
फिर भी अनजानी राह पर चलते हुए-
बहुत दिन हो गए!

भीड़ तो बहुत देखी हमने इस जमाने में,
मगर इस भीड़ में कोई अपना देखे-
बहुत दिन हो गए!  

जब मिलेगा कहीं वो हमें तो,
पूछेंगे यार कहां थे तुमसे मिले-
बहुत दिन हो गए!  

और जो करते थे साथ निभाने की बातें,
उनसे बिछड़े 'नाना' को बहुत दिन हो गए!! 
-एमएल मोदी (नाना)  

Monday, April 24, 2017

दिल के लहू में......डॉ. विजय कुमार सुखवानी


दिल के लहू में आँखों के पानी में रहते थे
जब हम माँ बाप की निग़हबानी में रहते थे

नये मकानों ने हम सब को तन्हा कर दिया
सब मिल जुल के हवेली पुरानी में रहते थे

माँ बाबा दादा दादी चाचा चाची बुआ
कितने सारे किरदार एक कहानी में रहते थे

कैसी चिंता कैसी बीमारी कहाँ का बुढ़ापा
तमाम उम्र हम लोग सिर्फ़ जवानी में रहते थे

ये कभी तो तन्हा मिले तो इस पर वार करें
सारे दुश्मन हमारे इसी परेशानी में रहते थे

जब तक बड़े बूढ़े सयाने हमारे घरों में रहे
हम लोग बड़े मज़े से नादानी में रहते थे

बड़े होकर किस किस के आगे झुकना पड़ा
जब छोटे थे सब हमारी हुक्मरानी में रहते थे

-डॉ. विजय कुमार सुखवानी