Saturday, December 10, 2016

प्रिय के लिये तरसता रहा.....मीना जैन


रात भर
मेरे आँगन
हरसिंगार झरता रहा

रात भर
पू्र्णिमा का चाँद
लहरों से गुहार करता रहा

रात भर
सागर का ज्वार
तट पर आकर गरजता रहा

रात भर
नेह का बादल
प्यासी पृथ्वी पर बरसता रहा

रात भर
विरही मन
प्रिय के लिये तरसता रहा

रात भर
हवाओं में
एक गीत का स्वर उभरता रहा ।

-मीना जैन

Friday, December 9, 2016

आ गए तुम.........निधि सक्सेना













आ गए तुम
द्वार खुला है
अंदर आ जाओ.. 

पर तनिक ठहरो 
देहरी पर पड़े पायदान पर
अपना अहंकार झाड़ आना..  

मधुमालती लिपटी है मुंडेर से
अपनी नाराज़गी वहीं उड़ेल आना ..

तुलसी के क्यारे में
मन की चटकन चढ़ा आना..

अपनी व्यस्ततायें बाहर खूंटी पर ही टांग देना
जूतों संग हर नकारात्मकता उतार आना..  

बाहर किलोलते बच्चों से
थोड़ी शरारत माँग लाना..  

वो गुलाब के गमले में मुस्कान लगी है
तोड़ कर पहन आना..  

लाओ अपनी उलझने मुझे थमा दो
तुम्हारी थकान पर मनुहारों का पंखा झल दूं..  

लाओ अपनी उलझने मुझे थमा दो
तुम्हारी थकान पर मनुहारों का पंखा झल दूं..  

देखो शाम बिछाई है मैंने
सूरज क्षितिज पर बांधा है
लाली छिड़की है नभ पर..  

प्रेम और विश्वास की मद्धम आंच पर चाय बनाई है
घूंट घूंट पीना..  

सुनो इतना मुश्किल भी नहीं हैं जीना.... 

















-निधि सक्सेना   
(यह कविता भोपाल निवासी निधि सक्सेना ने लिखी है। 
सोशल मीडिया पर इसे सुप्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा की रचना बता कर चलाया जा रहा है।)      

Thursday, December 8, 2016

मन इतना बेचैन तू क्यों है?......ममता भारद्वाज


मन इतना बेचैन तू क्यों है?
इस दुनिया में खोया क्यों है?

आंखों में तू ख्वाब सजा कर
दिल में लेकर बैठा क्यों है?  

पथ पर पग को चलने दे!
दीप सदा तू जलने दे!!

चाहे पथ पर काटे हो या राहों में सन्नाटे हो!
खुद में तुझको धैर्य है रखना!!  

कभी ना थकना कभी ना रुकना!
जीवन भर तू यूं ही चलना!!

जीवन की लीला है ये प्यारी!
इसी में लगती दुनिया न्यारी!!  

मन इतना बेचैन तू क्यों है?
इस दुनिया में तू खोया क्यों है?

- ममता भारद्वाज  

Wednesday, December 7, 2016

जागी हूं तो........निधि सक्सेना










आज रात नींद से 
नैनों पर तिरने की
और पलकों पर उतरने  की
बेवजह कोई गुहार नहीं ...  

जागी हूं तो
पिछले पड़े हुए काम निपटा लूं..
बासी पड़ा है नभ
इसे बुहार दूं..
मटियाली है हवा 
इसे छान लूं..  
गंदले हुए हैं तारे सारे..
उन्हें मांज कर वापस रख दूं..
जहां तहां से उधड़े बादल..
बखिया कर दूं..
बिखर गई है चांदनी..
करीने से उसे बिछा दूं.  

गृहणी हूं
बीनना मांजना
सीना पिरोना
इतना ही भर आता है..
अच्छा लाओ तुम्हारा मन 
उस पर आश्वस्ति के बटन टांक दूं
नेह के धागे में आंके बांके भाव पिरो दूं..  

वहां क्षितिज पर
ख़्वाहिशों की हाट लगी है
मोल भाव करुं
सस्ती हो तो
कुछ आंचल में भर लूं..  

अच्छा सुनो कुछ पैसे दे देना
कि उनको श्रद्धा समर्पण
नेह और विश्वास की निधि
से बदली कर दूं.. 
















-निधि सक्सेना    

Tuesday, December 6, 2016

लाल आँखें दिखाया नहीं करो............... प्राण शर्मा

बेहाल खुद को रोज़ बताया नहीं करो 
खुश हो तो दुःख की बात सुनाया नहीं करो

मन तो तुम्हारे फूल से कोमल हैं दोस्तो 
सोचों का बोझ इनसे उठाया नहीं करो 

कहते हैं, चिट्ठी लिख के बताना जरूरी है 
चुपके से दूर गाँव से आया नहीं करो 

माना कि भूल जाना कभी होता है मगर 
हर बार मेरी बात भुलाया नहीं करो 

उड़ जाएगा वो आप ही कुछ देर बैठ कर 
यूँ ही कोई परिंदा उड़ाया नहीं करो 

हर बच्चा देख के इन्हें डर जाता है हजूर 
गुस्से में लाल आँखें दिखाया नहीं करो 

अपनी भले ही कसमों को खाया करो मगर 
ऐ "प्राण" माँ की कसमों को खाया नहीं करो

-प्राण शर्मा

Monday, December 5, 2016

ये लोग पागल हो गए हैं..... नासिर काज़मी


तेरे से मिलने को बेकल हो गए
मगर ये लोग पागल हो गए हैं 

बहारें ले के आए थे जहां तुम 
वो घर सुनसान जंगल हो गए हैं 

यहां तक बढ़ गए आलाम-ए-हस्ती 
कि दिल के हौसले शल हो गए  

कहाँ तक ताब लाए नातवां दिल
कि सदमे अब मुसलसल हो गए हैं

उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना
यहां जो हादिसे कल हो गए हैं, 

जिन्हें हम देख कर जीते थे 'नासिर' 
वो लोग आँखों से ओझल हो गए हैं 

-नासिर काज़मी

Sunday, December 4, 2016

बेटी ही बेटा है..शबनम शर्मा

छुट्टियों के बाद स्कूल में मेरा पहला दिन था। नीना को सामने से आता देख मुझे अचम्भा सा हुआ। वह स्कूल की पी.टी. अध्यापिका है। पूरा दिन चुस्त-दुरुस्त, मुस्काती, दहाड़ती, हल्के-हल्के कदमों से दौड़ती वह कभी भी स्कूल में देखी जा सकती है। 
आज वह, 
वो नीना नहीं कुछ बदली सी थी। उसने अपने सिर के सारे बाल मुंडवा दिये थे। 
काली शर्ट व पैंट पहने कुछ उदास-सी लग रही थी। कुछ ही समय में पता चला कि इन छुट्टियों में उसके पापा की मृत्यु हो गई थी। 
सुनकर बुरा लगा। शाम को मैं करीब चार बजे उसके घर गई। उसने मुझे बैठक में बिठाया। पानी लाई व मेरे पास बैठ गई। 

पूछने पर पता चला कि उसके पिता की मृत्यु हृदय गति रूकने के कारण हुई थी। रात का समय था, वह उन्हें अस्पताल ले गई जहाँ डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। 

घर आकर उसने अपने रिश्तेदारों को पिता जी की मृत्यु की सूचना दे दी। सुबह पूरा जमघट लग गया। सवाल कि संस्कार पर कौन बैठेगा? 
चाचा के 3 बेटे थे। तीनों खिसक लिये। समय का अभाव था। नीना की दो बड़ी बहनें शादीशुदा थी, उनके बच्चे व पति भी व्यस्त थे। 

वह 10 दिन बैठ नहीं सकते थे। लाश को उठाने से पहले यह कानाफूसी नीना तक पहुँच गई। वह माँ के पास बैठी थी। उसने आँसू पोंछे व पिछवाड़े वाले ताऊजी से कहा जो रात से उनके साथ थे, ‘‘ताऊजी, मैं करूँगी पिताजी का अन्तिम संस्कार, मैं बैठूँगी सारी पूजा पर।’’ 

सबके दाँतों तले अंगुली आ गई। पर नीना ने किसी की परवाह न की। कंधे पर सफ़ेद कपड़ा रख कर, सबसे पहले अपने पापा की लाश को कंधा दिया व शमशान तक पूरी विधिपूर्वक सब कार्य किया। 

बताते-बताते उसकी आँखें कई बार नम हुई। बोली, ‘‘मैडम, मेरे पापा अक्सर कहते थे मेरी दो बेटियाँ, एक बेटा है। मुझे क्या पता था कि आज...........
’’ मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘‘नीना, मुझे तुझ पर गर्व है।’’
-शबनम शर्मा