Monday, October 29, 2012

कभी तो झरो शब्द-बूंद.....स्मृति आदित्य

कभी तो झरो
मुझ पर
एक ऐसी शब्द-बूंद
कि मेरी मन-धरा पर
प्रस्फुटित हो जाए
शर्माया हुआ प्यार का कोमल अंकुर
सिर्फ तुम्हारे लिए।

कभी तो रचों
मेरे इर्द गिर्द
शब्द-फूलों का रंगीन समां
कि मैं महकने लगूं और
भर जाऊं खुशियों की गंध से
सिर्फ तुम्हारे लिए।
कभी तो आने दो
मेरे कजरारे बालों तक
नशीली
शब्द-बयार का झोंका
कि मेरे पोर-पोर में
खिल उठें
ताजातरीन कलियां
सिर्फ तुम्हारे लिए।

कभी तो पहनाओं
अपनी भावनाओं को
ऐसे शब्द-परिधान
कि ‍जिन्हें देखकर लहरा उठें
मेरे भीतर का भीगा सावन
सिर्फ तुम्हारे लिए।

मत बरसाओं मुझ पर
ऐसी शब्द-किरचें
कि होकर लहूलुहान
मैं, बस रिसते जख्म ही
ला सकूं
तुम्हारे लिए!


--स्मृति आदित्य

8 comments:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति आदरेया ||

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  2. Bahut uttam Shungar Ras. Gajab ka prem geet Parsprik prem hmare sub anando ka shiromani hy.

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  3. आपकी उम्दा पोस्ट बुधवार (31-10-12) को चर्चा मंच पर | जरूर पधारें | सूचनार्थ |

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  4. वाह !!!!!!!! सुंदर भाव.........

    शब्द बूँद हों,शब्द फूल हों,या हों शब्द बयार
    बने शब्द परिधान पर , नहीं बनें तलवार ||

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  5. वाह !!!!!!!! सुंदर भाव.........

    शब्द बूँद हों,शब्द फूल हों,या हों शब्द बयार
    बने शब्द परिधान पर , नहीं बनें तलवार ||

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  6. बहुत गहन भाव लिए ... सुंदर प्रस्तुति

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  7. बहुत सुन्दर .बहुत खूब,बेह्तरीन अभिव्यक्ति

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