Sunday, September 28, 2014

अहिल्या को नहीं भुगतना पड़ेगा..........यशोदा



















विडम्बना
यही है की
स्वतंत्र भारत में
नारी का
बाजारीकरण किया जा रहा है,

प्रसाधन की गुलामी,
कामुक समप्रेषण
और विज्ञापनों के जरिये
उसका..........
व्यावसायिक उपयोग
किया जा रहा है.

कभी अंग भंगिमाओं से,
कभी स्पर्श से,
कभी योवन से तो
कभी सहवास से
कितने भयंकर परिणाम
विकृतियों के रूप में
सामने आए हैं,

यही नही
अनाचार के बाद
जिन्दा जला देने
जैसी निर्ममता से
किसी की रूह
तक नहीं कांपती

क्यों....क्यों..
आज भी
पुरुषों के लिये
खुले दरवाजे

और....और..
स्त्रियों के लिये
उफ.......
कोई रोशनदान तक नहीं?

मैं कहती हूँ....
स्त्री नारी होती नहीं
बनाई जाती है.

हम सबको
अब यह संकल्प लेना होगा
कि अब और नहीं..
कतई नहीं,
अब किसी इन्द्र के
पाप का दण्ड
अब किसी भी
अहिल्या को
नहीं भुगतना पड़ेगा

मन की उपज
-यशोदा

5 comments:

  1. बाज़ार आचार-विचार पर हावी है...

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  2. बड़ा गंभीर सवाल आप नें उठाया है इस मुद्दे पर समाज के हर तपके को अपनी आवाज को बुलंद करना होगा खासकर महिलाओं को जो जीवन की आपा धापी में ओर भौतिकता के चपेट में आती जा रहीं हैं एक क्रांति की आवश्यकता है यानी जेहाद की

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (29-09-2014) को "आओ करें आराधना" (चर्चा मंच 1751) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    शारदेय नवरात्रों की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. स्त्रिओं का शोषण समाज की चाल है! बराबर का दर्जा देना नहीं चाहते! ऑस्ट्रेलिया (और बाकी कई देशों में) औरत का दर्जा सिर्फ़ कानून में ही नहीं बलकी हर सामाजिक स्तर पर है! ये नहीं की यहाँ अपराध नहीं होता! लेकिन महिलाऐं अपने आप को सुरक्षित महसूस करती हैं और समाज उनको इस बात के लिये पूरा सहयोग भी देता है!.....सुन्दर रचना! हम सब को सहयोग देना चाहिए महिलाओं के इस संघर्स में

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