Wednesday, June 28, 2017

ईश्वर की कृपा जीवलोक तक.....नीरू मोहन

जापानी काव्य शैली ताँका

संरचना- 5+7+5+7+7= 31 वर्ण
दो कवियों के सहयोग से काव्य सृजन 
पहला कवि-5+7+5 = 17 भाग की रचना , 
दूसरा कवि 7+7 की पूर्ति के साथ श्रृंखला को पूरी करता |
पूर्ववर्ती 7+7 को आधार बनाकर अगली श्रृंखला 5+7+5 यह क्रम चलता रहता है इसके आधार पर अगली श्रृंखला 7+7 
की रचना होती है| इस काव्य श्रृंखला को रेंगा कहते थे |
5+7+5+7+7= 31 वर्ण

प्रभु भजन
प्राकृतिक सौंदर्य
उत्साही मन
नई ऊषा किरण
नवप्रभात संग
नई उमंग
नव चेतना लिए
धरा प्रसन्न
हर्षित जन-जन
उल्लासित है मन
विहग करें
सुरीला कलरव
मन मयूर
तन डोले बे-ताल
सुहावनी प्रभात
अरूण संग
स्वर्णिम गगन
मलय बहे
सुगंधित भू-तल
जीवलोक प्रसन्न ।।

Tuesday, June 27, 2017

"अनंत का अंत"......प्रगति मिश्रा 'सधु'









शब्द अथाह है, अपार है, अनंत है l
पर...उस "अनंत का अंत" शब्द मेरा है l
हर शब्द में एक कशिश ~~~~
एक नया उन्माद होता है
शब्द प्रेम है, शब्द अनुभव है 
शब्द तुममें है, शब्द मुझमें है 
शब्द है भाव की काया
शब्द है आँखों की माया
शब्द वाचाल है 
पर ....अनर्गल नहीं 
शब्द सार्थक है, निरर्थक नहीं 
किंतु मेरा शब्द अनन्य है .....
वह मूक है, मौन है 
निस्तेज है, सांकेतिक है वह l
उद्दीपन, आलंबन, स्थाईभावों को 
खुद में समेटे ...आंगिक - रसमयी है 
हाँ !!!! मेरा वह आलौकिक शब्द "नि:शब्द" है l
क्योंकि भाव शब्द का मोहताज नहीं ~~~l












-प्रगति मिश्रा 'सधु'

Monday, June 26, 2017

आजकल की लड़कियाँ.......डॉ. शैलजा सक्सेना

नीता चार साल बाद एम.बी.ए. कर के, अच्छी नौकरी पाकर न्यूयार्क से वापस हाथरस अपने घर पहुँची थी। उसे देख कर पूरा घर उमड़ आया। बड़े भैया, भाभी, और छोटी गुडिया सबसे आगे थे, पीछे से दोनों छोटी बहनें खिली पड़ रहीं थीं। मम्मी और दादी, चाची और उनके दोनों बेटे....सारा घर दरवाज़े पर से ही उसे बाँहों में भरने को तैयार था। भाभी ने आरती उतार कर ही उसे घर के अंदर आने दिया। वह हँस रही थी और शर्मा भी रही थी.."ऐसी कौन सी मेहमान है वो!!"
भाई-बहनों से दस बार लिपटने, गाल नोंचने और बाल खींचने के बाद भी किसी को तृप्ति नहीं हो रही थी। अटैची खुलने के साथ तो समां और बदल गया। किसी को वह कुछ देती तो दूसरा उसके पीछॆ भागता..कमरों के बीच बने, अंदर वाले आँगन में सबकी ख़ूब दौड़ भाग हो रही थी। वह भी सब के साथ बच्ची बन गई, चार साल का विदेशीपन, ऊँची पढ़ाई, ऑफ़िस का अच्छा पद, उस सब से जुड़ी सारी गंभीरता..चार पलों में उड़न-छू! भागा-दौड़ी के बीच ही उसे दादी के वो शब्द सुनाई दिये थे, जो वो माँ से कह रही थीं, "बहू! नीता को ज़रा नब (झुक) के चलने को कहो, पहाड़ सी यहाँ से वहाँ डोल रही है, लड़की की जात, उस पर से भारी पढ़ाई! ऐसे छाती निकाल के चलेगी तो लोग क्या कहेंगे? शादी के टोटे पड़ेंगे सो अलग, आजकल की लड़कियाँ भी बस....!!" दादी इसके बाद भी उसकी चिंता में बुदबुदाती रहीं।
नीता ने सुना! उसे लगा,घर की दीवारों ने सुना, आँगन ने सुना, भाई-बहनों ने भी सुना,रसोई ने सुना...वह हतप्रभ रह गई। फिर वह भाई-बहनों के खेल में भाग नहीं ले सकी। यह बात वो बचपन से सुनती आ रही है दादी से.. "ज़रा नब के चलो"!
पर पिछले सालों से वह अमरीका में दूसरी बात सुनती आ रही थी, "सीधे चलो"!
उसकी बॉस अक्सर उसे कहती, "क्या तुम से कोई ग़लती हुई है?"
वह हैरान होकर कहती, "नहीं!!"
"तो झुक कर क्यों बैठती हो?"
वह शर्मिंदा हो कर और सिकुड़ आती। उसकी अफ़सर उसकी "मैन्टोर" (गुरु) भी थीं। कोर्स समाप्त करने के बाद वह "इन्टर्नशिप" के लिये इसी कम्पनी में आई थी और उसका काम इतना अच्छा था कि उसकी अफ़सर ने उसे एक साल बाद जाने नहीं दिया और नौकरी दे दी। काम के साथ काम की प्रस्तुति के बारे में उसने बहुत कुछ "लॉरा", अपनी इस गुरू और अफ़सर से सीखा था। वो अकसर उसे कहतीं,
"तुम्हारे शरीर की भाषा, तुम्हारे बोले हुये शब्दों से अधिक महत्वपूर्ण होती है। अगर तुम झुक कर बैठोगी, खड़ी होगी तो आत्मविश्वास की कमी दिखाई देगी और तुम अच्छा काम करके भी सफल नहीं हो पाओगी। क्या तुम यह बर्दाश्त कर पाओगी कि तुम्हारा "इम्प्रेशन"(प्रभाव) अच्छा न पड़े?
नहीं! असफलता का कोई विकल्प नहीं है उसके लिये। नीता ने बहुत मेहनत करी है इस पड़ाव तक आने के लिए, अब इस एक छोटी सी बात के लिये वह अपनी सफलता के सपनों को दाँव पर नहीं लगा सकती!
पर तब भी बहुत कोशिशों के बाद भी वह आदतन झुक जाती। बहुत लम्बा समय लगा उसे और "लॉरा" उसे बराबर समझाती, टोकती रही, बिल्कुल दादी की तरह मगर बिल्कुल उल्टी बात के लिये।
और बाद में दोबारा शर्मिंदा हुई थी वह यह जान कर कि उसकी गर्दन और पीठ का तेज़ दर्द केवल इसलिये था क्योंकि वह सीधे नहीं चलती, सीधी नहीं बैठती।
माँ जानती हैं कि उसे किस दर्द और परेशानी से गुज़रना पड़ा था, कितनी रातें हीटिंग पैड पर गुज़ारनी पड़ी थीं! माँ जानती थी कि ऑफ़िस में भी उसे इस बात के लिये टोका जाता है। फोन पर अक्सर वो नीता की बातें सुनकर रुआँसी हो जातीं कि तू इतनी दूर है कि मैं वहाँ आकर तेरी कुछ मदद भी नहीं कर पा रही हूँ। पापा भी यह सब जानते थे..शायद सभी थोड़ा बहुत उसके दर्द के बारे में जानते थे..शायद दादी भी! पर दादी तो दादी हैं..घर की प्रमुख नियंत्रक..कड़क महिला...आज तक किसी ने उनसे पलट कर कुछ नहीं कहा पर उनकी डाँट से सब घबराते थे। बहुत ज़ोर से डाँटती थीं वो।
माँ ने भी उनकी यह बात सुनी, वो कुछ कहने जा रही थीं, कि उन्होंने नीता को हतप्रभ सा खड़ा देखा तो पहले उसके पास आ गईं! नीता के आँखों में एक भाव आता था, एक जाता था! इतनी छोटी सी बात लगती है, सीधे खड़े रहना, सीधे बैठना पर जिसे हमेशा झुक कर चलने को कहा गया हो, उसके लिये सीधे चलने की आदत डालना कितना कठिन होता है, वह जानती है! लॉरा हमेशा कहती.. "इट वोंट हैपन अंटिल यू डू इट (यह तभी होगा जब तुम करोगी)।"
इतनी कोशिशों के बाद उसे अभ्यास हुआ था सीधे बैठने, खडे होने का! और अब...
माँ ने उसे कंधे से घेर लिया, और दादी के पास आते हुए सधी आवाज़ में कहा, "माता जी, नीता को सीधे ही चलना है, सीधा खड़ा रहना है, सीधे ही बैठना है। किसी को अगर इस कारण हमारी लड़की पसन्द नहीं आती तो यह उनकी समस्या है, अब यह कभी झुक कर नहीं चलेगी!"
ड्यौढ़ी पार कर भीतर आते हुये पापा और चाचा ने माँ की बात सुनी, दादी ने भी हैरानी से सुना। आँगन ने सुना, घर की दीवारों ने सुना, बच्चों ने सुना, चौके में चाय बनाती चाची ने सुना..पहली बार नीता ने सुना ..और पाया कि उसकी माँ उस से भी कहीं ज़्यादा सीधी खड़ी है!
-डॉ. शैलजा सक्सेना

Sunday, June 25, 2017

ऐसा प्रेम मिला ही नहीं..........वन्दना गुप्ता

प्रेम के पनघट पर सखी री
कभी गागर भरी ही नही
मन के मधुबन मे
कोई कृष्ण मिला ही नही

जिसकी तान पर दौडी जाऊँ
ऐसी बंसी बजी ही नही
किस प्रीत की अलख जगाऊँ
ऐसा देवता मिला ही नही

किस नाम की रट्ना लगाऊँ
कोई जिह्वा पर चढा ही नही
कौन सी कालिन्दी मे डूब जाऊँ
ऐसा तट मिला ही नही

जिसके नाम का गरल पी जाऊँ
ऐसा प्रेम मिला ही नहीं
वो जोगी मिला ही नही
जिसकी मै जोगन बन जाऊँ

फिर कैसे पनघट पर सखी री
प्रीत की मैं गागर भर लाऊँ
- वन्दना गुप्ता

Saturday, June 24, 2017

''शेष क्या रहना है''....सविता चड्ढा













भान हो जाता है जब यह 
''शेष क्या रहना है''
जीवन और यथार्थ,
यथार्थ और  कल्पना,
कल्पना और सच के अंतर 
दृष्टव्य हो जाते है जब,
तब शून्य रह जाती है
मन की लहरों की चंचलता,
नेति नेति का ज्ञान हो जाता है ,
टूट जाती हैं व्यर्थ सीमाएं
बंधन रहित  हो जाता  तन मन ।
तब शांतचित्त नीला आसमान,
हरी भरी फूलों से लदी सारी धरती,
चांद, तारें,सूरज और 
विश्व के सभी नक्षत्र,
मेरी धरोहर हो जाते हैं।








-सविता चड्ढा
अनहद कृति से

Friday, June 23, 2017

प्रतिभा बहुत है.....निधि सक्सेना









एक दिन हमारे हाथ की रेखाएं पढ़ कर
एक ज्योतिष महाराज कहने लगे
प्रतिभा बहुत है
परंतु रेखायें इंगित कर रही हैं 
यश और गौरव नही हैं
प्रशस्ति लौट लौट जाती है
बृहस्पति बहुत हल्का है
वही कीर्ति रोक रहा है..

पुखराज पहने तर्जिनी में
भाग्य घुटनों के बल चल कर आएगा
सोया बृहस्पति जागेगा..
हमनें सोचा
वो भाग्य ही क्या
जिसे कोई पत्थर जगाये

अगर भाग्य हमारा है
और हमें उसे जगाने की इच्छा है
तो यथेष्ट कर्म भी हमें ही करने होने..

अगर हमारा भाग्य एक छोटा सा पत्थर जगा सकता है
तो हम क्यों नही..
वैसे भी अपने भाग्य को जगाने सुलाने की
और फल निष्फल की जिम्मेदारी
हमारी है 
बेचारे पुखराज की थोड़ी है..

सो हमने रेखाओं पर एक दॄष्टि डाली 
महाराज को प्रणाम किया
हाथ झाड़ा और चले आये...
अपने यश की तृष्णा के लिए
आँखो पर पट्टी बाँध
किसी पत्थर का अनुगामी बनना 
हमे मंज़ूर नही...
~निधि सक्सेना

Thursday, June 22, 2017

इस कठिन समय में .....परितोष कुमार 'पीयूष'



इस कठिन समय में
जब यहाँ समाज के शब्दकोश से
विश्वास, रिश्ते, संवेदनाएँ
और प्रेम नाम के तमाम शब्दों को
मिटा दिये जाने की मुहिम जोरों पर है 

तुम्हारे प्रति मैं 
बड़े संदेह की स्थिति में हूँ
कि आखिर तुम अपनी हर बात
अपना हर पक्ष
मेरे सामने इतनी सरलता
और सहजता के साथ कैसे रखती हो

हर रिश्ते को निश्छलता के साथ जीती
इतनी संवेदनाएँ कहाँ से लाती हो तुम 
बार-बार उठता है यह प्रश्न मन में
क्या तुम्हारे जैसे और भी लोग
अब भी शेष हैं इस दुनिया में

देखकर तुम्हें
थोड़ा आशान्वित होता हूँ 
खिलाफ मौसम के बावजूद
तुम्हारे प्रेम में
कभी उदास नहीं होता हूँ

-परितोष कुमार 'पीयूष'

Wednesday, June 21, 2017

चुप..........भास्कर चौधुरी









पिता के पिता ने कहा
पिता से
चोप्प
दुबक गए पिता
किताबों की अलमारी के पीछे

पिता ने मुझसे कहा
चुप
मैंने दरवाजा खोला
बाहर निकल गया घर से
और  बाहर ही रहा
खाने के वक्त तक
घूमता रहा इधर-उधर
बेमतलब

मैंने बेटी से कहा
चुप्प
उसने पलट कर जवाब दिया !!
-भास्कर चौधुरी

Tuesday, June 20, 2017

इच्छाओं की गगरी....डॉ. विवेक कुमार












यह मेरा है
यह तेरा है 
मोह माया का फेरा है।

जीवन तो 
चंद दिनों का 
डेरा है।

संबंधों 
और रिश्तों का 
यह तो बस एक 
घेरा है।

लाख लिखे कोई
जीवन का काग़ज़
रहता कोरा है।

इच्छाओं की गगरी
भरे कैसे 
यही तो बस
एक फेरा है।

इश्क़-जुनून और 
रिश्तों की बगिया में मँडराता
स्वार्थ का भौंरा है।
- डॉ. विवेक कुमार

Monday, June 19, 2017

हर पल याद करता है....अज्ञात रचनाकार

ये वक्त भी नूर को 
बेनूर बना देता है।
छोटे से जख्म को 
नासूर बना देता है।

कौन चाहता है 
अपनों से दूर रहना।
मगर वक्त सब को 
मजबूर बना देता है।

रहते है दूर मगर दिल 
उन्हे हर पल याद करता है।
दिल हर पल याद में 
उनकी उदास रहता है।

काश कि वक्त भी 
हमारे हाथ में होता।
ना कोई दूर होता 
ना दिल कभी उदास होता॥
- अज्ञात रचनाकार 

Sunday, June 18, 2017

अनपढ़ माँ....कृष्णा वर्मा

यूँ तो गोमती रोज़ ही अपने बहू-बेटे को सर फेंक कर काम में जुटा देखती, लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसने जो जुनून उनमें देखा, ऐसा पहले कभी नहीं देखा! - 

दिन-रात वह दोनों कमप्यूटर पर दीदे गड़ाए रहते। आपस में खुसुर-पुसुर करते, आशा-निराशा साफ़ उनके मुख पर तैरती नज़र आती। ऐसा आभास होता जैसे किसी ख़ास काम की खोज में हों। कई बार अंग्रेज़ी में किसी से फोन पर भी लम्बा वार्तालाप करते सुना, पर गोमती ने कभी कुछ पूछा नहीं। 

जब कभी भी वह उनके आस-पास उपस्थित होती तो बहू-बेटा अचानक अंग्रेज़ी में बतियाने लगते। पिछले कुछ दिनों से कभी-कभार बेटा माँ से लाड़-प्यार भी जताने लगा था। 

और तो और, सास की कही बातों पर अचानक बहू ने मुँह फुलाना भी छोड़ दिया था। 

यह सब देख गोमती मन ही मन बुदबुदाती, "हो ना हो कुछ घुईंयाँ तो पक रही हैं।” 

कभी वह अनजानी शंका में घिर कर ख़ुद ही मन को ढा लेती और कभी ख़ुद ही ढाढ़स दे फिर कामों को निपटाने में लग जाती। 

कुछ ही दिनों बाद घर का माहौल बदला-बदला सा लगने लगा। बहू-बेटा चहके-चहके से नज़र आने लगे। चारों ओर अचानक अबोली ख़ुशी का नाद सुनाई देने लगा। कुल मिला कर कहें तो घर में रामराज्य सा हो गया।

छुट्टी का दिन था, माँ ने मेज़ पर नाश्ता लगाया। मनपसंद व्यंजन देखते ही बेटा बोला, "अरे वाह! क्या बात है माँ, आज तो सब कुछ अपने बहू-बेटे की पसंद का बनाया है।"


फीकी सी मुस्कान देते गोमती बोली, "अरे खा लो बेटा, क्या पता फिर कब! अच्छा, यह तो बता कब का जाना तय किया है विदेश?”


यह सुनते ही, पति-पत्नि एक दूसरे को आवाक देखते रह गए। उनकी आँखें ऊपर की ऊपर ही टँगी रह गईं और मुँह तो जैसे निवाला चबाना ही भूल गया। बिना उनकी ओर ताके गोमती बोली, "अरे! खाओ भई, रुक क्यों गए? क्या अच्छा नहीं लगा?”


सकपकाते हुए से दोनों एक साथ ही बोले, “ नहीं-नहीं, बहुत स्वादिष्ट बना है। लेकिन माँ, तुम्हें किसने बताया हमारे जाने का?”

"तेरी माँ भले स्कूल ना गई हो बेटा, पर उसकी आँखें बहुत पढ़ी-लिखी हैं। जीवन में अनुभवों की कई जमातें पास की हैं उसने। फिर तुम्हारी गुलाबी मुस्कानों के पीछे का पढ़ लेना कौन मुश्किल है उसके लिए!"

-कृष्णा वर्मा








Saturday, June 17, 2017

खुज़ली



होती है
अजीबो गरीब
खुजली

किसी को भी
कहीं भी
हो सकती है
खुज़ली

जब चाहो
जहाँ चाहो
कर लो
खुज़ली..

आदमी ही नहीं
जानवरों को भी
होती है 
खुज़ली

और तो और
गणमान्य लोगों
को भी होती है
खुज़ली

ज़बान उनकी
हरदम
खुजलाते रहती है
उसी खुज़ली को
निरख

मीडिया वालों को भी
होने लगती है
खुज़ली

जहाँ-तहाँ
खुज़ला डालते हैं
उन्हें नही लगता
डर..

देखा-देखी..
अन्य चैनल भी
नहीं होते 
हुए भी
नमक-मिर्च
डालकर
पैदा कर लेते
खुज़ली

उसी खुज़ली 
के चलते
हो जाता है
हंगामा 

हंगामे के
दौरान
चलती हैं 
गोलिंया भी

और सरकार..
गोली खाने 
वाले को...
स्वादिष्ट
मरहम लगा
देती है


क्या गया
सरकार का
खुज़ली तो 
खुज़ली ही है

कभी भी 
कहीं भी
किसी को भी
हो सकती है
खुजली..

लोगों को
इन्तज़ार है
दूसरी 
खुज़ली का

मन की उपज
यशोदा









Friday, June 16, 2017

मै तेरी बेवफ़ाई पर भी फ़ना हो जाऊं...मनीष कुमार सिंह


जो रूह को सकूं दे ऐसा कोई शजर तो हो
बस अमन के पैगाम बसे ऐसा कोई नगर तो हो

मै तेरे घर तक आ जाऊं बड़ी खुशमिजाजी से
जो सिर्फ़ मुझे ही दिखाई दे ऐसी कोई डगर तो हो

मै कब से तरस रहा हूँ रो रहूँ चाह भी रहा
एक मर्तबा तेरे होंठो पर मेरा कोई ज़िकर तो हो

मै झुक भी जाऊं और रोज तेरा करूँ सजदा
मुझे भी उठाने की तुझको कोई फ़िकर तो हो

ख़ुद पर यकीं लाने लगूं तुझे झूम के चूमूं
मेरी ज़िन्दगी तुझमे अब कोई सहर तो हो

मै तेरी बेवफ़ाई पर भी फ़ना हो जाऊं ‘मनीष’
बस तेरे हाथों से दिया कोई जहर तो हो


Thursday, June 15, 2017

पहली बारिश...निधि सक्सेना
















 ये झम झम बारिश
ये धुंधुआता मंजर
ये सिमटी चाँदनी
ये बूँदो की झर झर
ये बहकी हवायें
ये गगनभेदी गड़गड़
ये भीनी आँख
ये भीगा मन
गर तुम साथ होते
तो कुछ और बात होती...
~निधि सक्सेना

Wednesday, June 14, 2017

The Bathtub Test ...

यह प्रस्तुति हिन्दी में है, अंग्रेजी जानने वाले न पढ़ें

The Bathtub Test ...

During a visit to the mental asylum, a visitor asked the Director how do you determine whether or not a patient should be institutionalized.

"Well," said the Director, "we fill up a bathtub, then we offer a teaspoon, a teacup and a bucket to the patient and ask him or her to empty the bathtub."

"Oh, I understand," said the visitor. "A normal person would use the bucket because it's bigger than the spoon or the teacup."

"No." said the Director, "A normal person would pull the plug. Do you want a bed near the window?" 

ARE YOU GOING TO PASS THIS ON, 
OR DO YOU WANT THE BED NEXT TO MINE?


Tuesday, June 13, 2017

महसूस कर लिया मैंनें..........अनमोल तिवारी कान्हा
















पत्र तुम्हारा मिल गया कोरा
देखकर पढ़ा मैंने 
और चूमा उसे
कलेजे से लगाकर रख दिया,
अनकही थी जो बातें 
वो सब खुल गई
कालिमा मन में भरी थी
वो सब धुल गई।।
छेड़ दी सरगमें चाहत की
कितना लिखे कैसे लिखे ?
शब्द थे कम
इसलिए तुमने तुम्हारे पत्र में
कुछ नहीं लिखकर भी
सब कुछ लिख दिया
और मैंने देखकर पढ़ा चूमा
और सीने से लगाकर रख दिया।

बड़ा अजीब है
तुम्हारे कहने का ढंग
बिना शब्दों के भी सब
महसूस कर लिया मैंने।।
-अनमोल तिवारी कान्हा
शब्दावली: 
कोरा=खाली(बिना लिखा), कालिमा=दुर्भावनाँए, सरगमें=राग संगीत

Monday, June 12, 2017

सच में है दीन जिन्दगी....श्यामल सुमन

जो दिखती रंगीन जिन्दगी
वो सच में है दीन जिन्दगी

बचपन, यौवन और बुढ़ापा
होती सबकी तीन जिन्दगी

यौवन मीठा बोल सके तो
नहीं बुढ़ापा हीन जिन्दगी

जीते जो उलझन से लड़ के
उसकी है तल्लीन जिन्दगी

वही छिड़कते नमक जले पर
जिसकी है नमकीन जिन्दगी

दिल से हाथ मिले आपस में
होगी क्यों गमगीन जिन्दगी

जो करता है प्यार सुमन से
वो जीता शौकीन जिन्दगी
-श्यामल सुमन....फेसबुक से

Sunday, June 11, 2017

खा जाइएगा क्या....कुसुम शुक्ला


मुझे चिकन बिरयानी सोचकर ही खा जाइएगा क्या 
औरत हूँ तो आँखों से नोचकर ही खा जाइएगा क्या

माना मेरा जिस्म नर्म, नाजुक, गोरा और मखमली है
तो गिद्द सी निगाहों से खरोंचकर ही खा जाइएगा क्या

तन से थोड़ा आगे बढ़िये, मैं मन भी हूँ, मैं रूह भी हूँ
खुली हुई पलकों में दबोचकर ही खा जाइएगा क्या

मुझे सुनाई देती है लार में डूबी तुम्हारी खामोश लिप्सा 
गन्दे - गन्दे लफ्जों से टोंचकर ही खा जाइएगा क्या

दिल का कलुष तुम्हारी बोली से नहीं मिल रहा 
जुबाँ से अपने होठों को पोंछकर ही खा जाइएगा क्या

-कुसुम शुक्ला.. फेसबुक से

Saturday, June 10, 2017

अब उसके एक पूँछ ऊग आई है....निधि सक्सेना











उसने ब्याह किया
और समझा कि अब वो पूर्ण हुआ
कि अब उसके एक पूँछ ऊग आई है
जो हमेशा उससे बँधी रहेगी
हर वक्त उसके पीछे चलेगी..
उसकी सफलता पर
मगन मस्त हिलेगी..
उसकी ख़ुशी में नाचेगी..
उसकी उदासी में
सीधी लटक जायेगी..
जब किसी अजनबी से मुख़ातिब होगा
सहम कर दुबक जायेगी..
जब कभी उद्विग्न होगा
डर कर पैरों में घुस जायेगी..
उसके हर भाव को अचूक अभिव्यक्त करेगी..
हाँ वो एक हद तक अच्छी पूँछ साबित हुई
और वो विशुद्ध ????
~निधि सक्सेना

Friday, June 9, 2017

तन -मन भिगो रही आज ... अलका गुप्ता

यादों की हरश्रृंगारी महक ।
अल्हड उन बतियों की चहक ।

ढलकी - ढलकी चितवन ये 
रूखे अधरों का कंपन ये ।

बिखर गई अलकों में ...
बीते दिनों की राख सी ...

सिमट गई लाली जो ...
झुर्रियों में अनायास ही ...

कसक बहुत रही है आज ।
जो तोड़ ना सके थे कायर हाथ ।

उन बीते दिनों के अनचाहे ...
बंधनों की झूठी लाज ।।

-अलका गुप्ता 

Thursday, June 8, 2017

चांद बेवफा नहीं होता.....स्मृति आदित्य









चांद नहीं कहता 
तब भी मैं याद करती तुम्हें 
चांद नहीं सोता 
तब भी मैं जागती तुम्हारे लिए 
चांद नहीं बरसाता अमृत 
तब भी मुझे तो पीना था विष 
चांद नहीं रोकता मुझे 
सपनों की आकाशगंगा में विचरने से 
फिर भी मैं फिरती पागलों की तरह 
तुम्हारे ख्वाबों की रूपहली राह पर।   

चांद ने कभी नहीं कहा 
मुझे कुछ करने से 
मगर फिर भी 
रहा हमेशा साथ 
मेरे पास
बनकर विश्वास। 
यह जानते हुए भी कि 
मैं उसके सहारे   
और उसके साथ भी
उसके पास भी 
और उसमें खोकर भी 
याद करती हूं तुम्हें। 
मैं और चांद दोनों जानते हैं कि 
चांद बेवफा नहीं होता। 
-स्मृति आदित्य

Wednesday, June 7, 2017

लौट के वो घर आती है....अलका प्रमोद







दौड़ में अंधी दौड़ पड़े हो, 
दूर देश में जा बसने,
पर कितने दिन रह पाओगे, 
उखड़ के जड़ से तुम अपने,

कब तक ऊंचे उड़ोगे आख़िर, 
कभी तो तुम थक जाओगे ,
तब ढूँढोगे एक छाँव पर, 
कहीं न ढूंढे पाओगे,

देखा है चिड़िया को उड़ते, 
लौट के वो घर आती है,
जब तक बंधी पतंग डोर से, 
तभी तलक उड़ पाती है,

है अभी समय मुड़ कर देखो, 
घर राह तुम्हारी तकता है,
हवा अभी भी है अपनी, 
बंद किया तुम्हीं ने रस्ता है,

खोलो खिड़की पिछवाड़े की हवा 
उधर से भी आने दो,
थाम के रखो नेह डोर, 
पहचान न पथ की खो जाने दो। 
-अलका प्रमोद