Friday, May 26, 2017

वसुधैव कुटुम्बकम.................प्रभांशु कुमार


ना मुसलमान खतरे में है
ना हिन्दू खतरे में है
धर्म और मजहब से बँटता
इंसान खतरे में है
ना राम खतरे में है
ना रहमान खतरे में है
सियासत की भेंट चढ़ता
भाईचारा खतरे में है
ना कुरान खतरे में है
ना गीता खतरे में है
नफरत की दलीलों से
इन किताबों का ज्ञान खतरे में है
ना मस्जिद खतरे में है
ना मंदिर खतरे में है
सत्ता के लालची हाथों
इन दीवारों की बुनियाद खतरे में है
धर्म और मजहब का चश्मा
उतार कर देखो दोस्तों
अब तो हमारा
हिन्दुस्तान खतरे में है
-प्रभांशु कुमार
133/11ए अवतार टॉकीज के पीछे तेलियरगंज
इलाहाबाद- 211004
मो-7376347866


Thursday, May 25, 2017

बुरा क्या है हकीकत का अगर इज़हार हो जाए.....सतविन्दर कुमार

किसी मरते को जीने का वहाँ अधिकार हो जाए
अगर सहरा में पानी का ज़रा दीदार हो जाए

ये गिरना भी सबक कोई सँभलने के लिए होगा
मिलेगी कामयाबी हौंसला हर बार हो जाए

वफ़ा करके नहीं मिलती वफ़ा सबको यहाँ यारो
किसी की जीत उल्फत में,किसी की हार जाए

कि खुलकर आज कह डालो दबी है बात जो दिल में
*बुरा क्या है हकीकत का अगर इज़हार हो जाए*

खमोशी को हमेशा ही समझते हो क्यों कमजोरी?
यही गर्दिश में इंसाँ का बड़ा औज़ार हो जाए

सितमगर सोच कर करना सितम तू और लोगों पर
यही तेरी ख़ता उनका कहीं हथियार हो जाए
-सतविन्दर कुमार
ओपन बुक ऑन लाईन से

Wednesday, May 24, 2017

राजनीतिज्ञ..........राम कृष्ण खुराना

प्राचीन काल में एक जंगल में एक शेर राज्य किया करता था। उसके तीन मंत्री थे। बन्दर, भालू और खरगोश। दरबार लगा हुआ था। तीनों मंत्री राजा के इर्द-गिर्द बैठे हुए थे। अचानक शेर ने जुम्हाई लेने के लिए
मुँह खोला तो उसके पास ही बैठा भालू बोल पड़ा – "जहांपनाह, आप रोज़ सुबह उठ कर टुथ-पेस्ट अवश्य किया करें। आपके मुँह से बदबू आती है।"
शेर का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। वह गरज कर बोला –
 "यू ब्लडी। तेरी यह मज़ाल?" शेर ने एक झपटा मारा और भालू को खा गया।
दूसरे दिन जब शेर दरबार में आया तो उसने बन्दर से पूछा – 
"मंत्री जी, बताईये हमारे मुँह से कैसी गन्ध आ रही है?"
बन्दर ने भालू का अंत अपनी नंगी आँखों से देखा था। वह हाथ जोड़ कर बोला – वल्लाह जहांपनाह। क्या बात है? आप हँसते हैं तो फूल गिरते हैं। जब आप बोलते हैं तो मोती झड़ते हैं। आपके मुँह से इलायची की ख़ुशबू आती…!"
"शट-अप," शेर ने बन्दर को अपनी बात पूरी करने का अवसर भी न दिया। वह बोला- "हम जंगल के राजा हैं। रोज़ कई जानवरों को मार कर खाते हैं। हमारे मुँह से इलायची की ख़ुशबू कैसे आ सकती है? तुम झूठ बोलते हो।" इतना कहकर शेर बन्दर को भी हज़म कर गया।
तीसरे दिन शेर ने अपने तीसरे मंत्री खरगोश से भी वही सवाल किया।
खरगोश दोनों का हश्र देख चुका था। वह हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। एक क़दम पीछे हट कर, सिर झुका कर बोला – 
"गुस्ताखी माफ़ हो सरकार। मुझे आजकल ज़ुकाम लगा हुआ है। जिसके कारण मैं आपके प्रश्न का उत्तर दे पाने में असमर्थ हूँ।"
शेर कुछ नहीं बोला।
खरगोश राजनीतिज्ञ था।
-राम कृष्ण खुराना
डेल्टा, (ब्रिटिश कोलंबिया) कैनेडा

Tuesday, May 23, 2017

रास्तों पर किर्चियाँ फैला रहा....मनन कुमार सिंह


वह जमीं पर आग यूँ बोता रहा
और चुप हो आसमां सोया रहा ।1।

आँधियों में उड़ गये बिरवे बहुत
साँस लेने का कहीं टोटा रहा ।2।

डुबकियाँ कोई लगाता है बहक
और कोई खा यहाँ गोता रहा ।3।

पर्वतों से झाँकती हैं रश्मियाँ
भोर का फिर भी यहाँ रोना रहा ।4।

हो गयी होती भली अपनी गजल
मैं पराई ही कथा कहता रहा ।5

चाँदनी छितरा गयी अपनी सिफत
गिनतियों में आजकल बोसा रहा ।6।

पोंछ देता अश्क मुंसिफ,था सुना,
वज्म में करता वही सौदा रहा ।7।

मर्तबा जिसको मिला,सब भूलकर
रास्तों पर किर्चियाँ फैला रहा ।8।

दिन तुम्हारे भी फिरेंगे,यह सुना
आदमी को आदमी फुसला रहा ।9।
- मनन कुमार सिंह
ओपन बुक ऑन लाईन से

Monday, May 22, 2017

और हम तैयार हो गये.......गौतम कुमार “सागर”









दंगो में चमचे ,
चिमटे भी हथियार हो गये
भीड़ जहाँ देखी..
.... उसके तरफदार हो गये !
शोहरतमंदों का ग्राफ.....
नीचे गिरा
तो कब्र बन गये
और उँचा हुआ तो..
गर्दने ऐंठ गयी
कुतुब मीनार हो गये !
अजब रोग है ...
इन खूब अमीर
मगर गुनाहगार लोगों का
मुक़दमे की........
हर तारीख पे ........
बीमार हो गये !
सियासत गंभीर मुद्दा
..... या अँग्रेज़ी वाला “फन “
क़व्वाली-ए-चुनाव में........
बेसुरे भी
फनकार हो गये !
बचपन में........
माँ जब स्कूल भेजती थी
बालों में तेल चुपड़ कर..
कंघी की... और  ह्म तैयार हो गये !
-गौतम कुमार “सागर”

Sunday, May 21, 2017

ये शेष रह जाएंगे...अंजना बाजपेई











कुछ गोलियों की आवाजें
बम के धमाके ,
फैल जाती है खामोशी ...
नहीं, यह खामोशी नहीं 
सुहागिनों का, बच्चों का,
मां बाप का करूण विलाप है,
मूक रूदन है प्रकृति का ,
धरती का, आकाश का .....

जलेंगी चिताएं और विलीन हो जायेंगे शरीर
जो सिर्फ शरीर ही नहीं

प्यार है, उम्मीदें है, विश्वास है, आशा है ,
बच्चों के, भाई बहनों के, पत्नी, माँ बाप और
सभी अपनों के
वह सब भी जल जायेंगे
विलीन हो जायेंगे शरीर
पंचतत्वों में धुँआ बनके, राख बनके ,
आकाश, हवा, पानी मिट्टी और अग्नि में 
सब विलीन हो जायेंगे ...

कौन कहेगा उनके बच्चों से - 
बेटा आप खूब पढ़ो मै हूँ ना ?
कौन उनको प्यार देगा, 
जिम्मेदारी उठायेगा ??

कैसे बेटियाँ बाबुल के गले लगकर विदा होंगी ?
उनकी शादी बिन बाबुल के कैसे होगी?

बुजुर्ग माँ, पिता, पत्नी, बहन, भाई 
सबके खामोश आँसू बह रहे,
दर्द समेटे 
कैसे जी रहे उनको कौन संभालेगा?

ये सारे कर्तव्य शेष रह जायेंगे ,
ये विवशता के आँसू, 
ये पिघलते सुलगते दर्द बन जायेगें,
ये हवा में रहेंगे 
सिसकियाँ बनकर, 
पानी में मिलेंगे पिघले दर्द बनकर ,
मिट्टी में रहेंगे, आकाश में, बादल में रहेंगे,

ये कहीं विलीन ना हो सकेंगे
मिट ना सकेंगे.....
इन्हें कोई पूरा नहीं कर सकेगा, 
ना सरकार, ना रिश्तेदार ,
ये कर्तव्य, ये फर्ज 
अनुत्तरित प्रश्न बन जायेगे ,
ये शेष रहेंगे, ये शेष रह जाएंगे...
-अंजना बाजपेई
जगदलपुर (बस्तर )
छत्तीसगढ़....

Saturday, May 20, 2017

वो दरबदर हो गया है....विशाल मौर्य विशु


जमाने को भी ये खबर हो गया है
मुहब्बत तो तनहा सफर हो गया है

ना तो दिन ढलते हैं ना ही रातें गुजरती
जुदाई का  ऐसा  असर  हो गया है

जहाँ ख्वाबों का मेला लगता था हर पल
शहर दिल  का वो  दरबदर हो गया है

उसे चाहा था हमने साँसों की तरह
किसी और का वो मगर हो गया है
-विशाल मौर्य विशु

Friday, May 19, 2017

दो क्षणिकाएँ..... नादिर खान












तुम अक्सर कहते रहे
मत लिया करो
मेरी बातों को दिल पर
मज़ाक तो मज़ाक होता है
ये बातें जहाँ शुरू
वहीं ख़त्म ....
और एक दिन
मेरा छोटा सा मज़ाक
तार –तार कर गया
हमारे बरसों पुराने रिश्ते को
न जाने कैसे.........













  



घर की मालकिन ने
घर की नौकरानी को
सख्त लहजे में चेताया
आज महिला दिवस है
घर पर महिलाओं का प्रोग्राम है
कुछ गेस्ट भी आयेंगे
खबरदार !
जो कमरे से बाहर आई
टांगें तोड़ दूँगी........
-नादिर खान 

.

Thursday, May 18, 2017

जीने की एक वजह काफी है.....विभा परमार


तलाशने की
कोशिश करती हूँ
जीवन से बढ़ती

उदासीनता की वजहें
रोकना चाहती हूं
अपने भीतर पनप रही
आत्मघाती प्रवृत्ति को
पर नजर आते हैं
धूप-छांव से इतने रंज औ गम
रेत की आंधियों सी मिली चोटें
और सूख चुकी पत्तियों सी उम्मीदें
कि न जीने के कारण तलाशना छोड़,
एक बार फिर से बारिश में
बाहें फैलाए जी भर के भीगूं
-विभा परमार 

Wednesday, May 17, 2017

इतने वीभत्स वार क्यूँ.....अलका गुप्ता


जंगल की कंदराओं से निकल तुम |
सभ्यताओं के सोपान इतने चढ़े तुम |

क्यूँ हो अभी भी दानव.... इतने तुम !
अत्याचार ये..इतने वीभत्स वार क्यूँ ?

मानवता आज भी इतनी निढाल क्यूँ ?
बलात्कार हिंसा यह.....लूटमार क्यूँ ?

साथ थी विकास में संस्कृति के वह |
उसका ही इतना.......तिरस्कार क्यूँ ?

प्रकट ना हुआ था प्रेम-तत्व.....तब |
स्व-स्वार्थ निहित था आदिमानव तब |

एक माँ ने ही सिखाया होगा प्रेम...तब |
उमड़ पड़ा होगा छातियों से दूध...जब |

संभाल कर चिपकाया होगा तुझे तब |
माँस पिंड ही था एक....तू इंसान तब |

ना जानती थी फर्क...नर-मादा का तब |
आज मानव जान कर भी अनजान क्यूँ ?

जंगल की कंदराओं से निकल...तुम |
सभ्यताओं के सोपान इतने चढ़े तुम||



-अलका गुप्ता 

Tuesday, May 16, 2017

चाहा था हमने साँसों की तरह....विशाल मौर्य विशु


जमाने को भी ये खबर हो गया है
मुहब्बत तो तनहा सफर हो गया है

ना तो दिन ढलते हैं ना ही रातें गुजरती
जुदाई का  ऐसा  असर  हो गया है

जहाँ ख्वाबों का मेला लगता था हर पल
शहर दिल  का वो  दरबदर हो गया है

उसे चाहा था हमने साँसों की तरह
किसी और का वो मगर हो गया है
-विशाल मौर्य विशु

Monday, May 15, 2017

सारा मकां सोया पड़ा है.....आबिद आलमी


वो जिन्हें हर राह ने ठुकरा दिया है,
मंज़िलों को ग़म उन्हीं को खा रहा है

मेरा दिल है देखने की चीज़ लेकिन
इस को छूना मत कि यह टूटा हुआ है

अजनबी बन कर वो मिलता है उन्हीं से
जिन को वो अच्छी तरह पहचानता है

चीखती थी ईंट एक इक जिसकी कल तक
आज वो सारा मकां सोया पड़ा है

क्या अलामत है किसी क़ब्ज़े की 'आबिद'
ये जो मेरे घर पे कुछ लिखा हुआ है
रामनाथ चसवाल (आबिद आलमी)

श्री राम नाथ चसवाल को 
उर्दू साहित्य में 
'आबिद आलमी' के नाम से जाना जाता है।

Sunday, May 14, 2017

जानती हूँ ...मेरी माँ....अलका गुप्ता

.......मातृ-दिवस पर विशेष......

कुछ दिल में अरमान हैं ।
मैं भी कुछ करूँ ...।
यूँ ही न मरुँ ...।
दुनियां अपनी करूँ ।।
चंद सांसें मुझे भी ,
जी लेने दे ...मेरी माँ !
जानती हूँ ...मेरी माँ !
तुम्हारे दिल का दर्द ।
जो तुमने झेला है ।।
उससे ही बचाना है ।
मगर कुछ सोचो... माँ !
हिम्मत कर माँ !!
अजन्मी इस बेटी को ...
तुझे आज बचाना है ..!!!
क्यूंकि दिल में .....
उसके भी .....
कुछ अरमान हैं ।।
-अलका गुप्ता 

Saturday, May 13, 2017

तड़पन............डॉ. सुषमा गुप्ता

हवा बजाए साँकल ..
या खड़खड़ाए पत्ते..
उसे यूँ ही आदत है 
बस चौंक जाने की।

कातर आँखों से ..
सूनी पड़ी राहों पे ..
उसे यूँ ही आदत है 
टकटकी लगाने की। 

उसे यूँ ही आदत है ...
बस और कुछ नहीं ...
प्यार थोड़े है ये और
इंतज़ार तो बिल्कुल नहीं।

तनहा बजते सन्नाटों में..
ख़ुद से बात बनाने की..
उसे यूँ ही आदत है 
बस तकिया भिगोने की।

यूँ सिसक-सिसक के..
साथ शब भर दिये के ..
उसे यूँ ही आदत है 
बस जलते जाने की।

उसे यूँ ही आदत है.. 
बस और कुछ नहीं ...
प्यार थोड़े है ये और 
तड़पन तो बिल्कुल नहीं।

-डॉ. सुषमा गुप्ता
suumi@rediffmail.com

Friday, May 12, 2017

बँधे हैं हम..............सुशांत सुप्रिय









कितनी रोशनी है,
फिर भी कितना अँधेरा है!

कितनी नदियाँ हैं,
फिर भी कितनी प्यास है!

कितनी अदालतें हैं,
फिर भी कितना अन्याय है!

कितने ईश्वर हैं,
फिर भी कितना अधर्म है!

कितनी आज़ादी है,
फिर भी कितने खूँटों से
बँधे हैं हम!
-सुशांत सुप्रिय

Thursday, May 11, 2017

सैनेटाइजर का प्रयोग ना हीं करें तो बेहतर है....गगन शर्मा

गर्मी के बावजूद इस बार अप्रैल में कई जगह आना-जाना करना पड़ा था। जिसमें सालासर बालाजी के दर्शनों का सुयोग भी था।
 जिसका ब्यौरा पिछली पोस्ट में कर भी चुका हूँ। पर इस यात्रा के दौरान एक चीज पर ध्यान गया कि टी.वी पर रोज हर मिनट बरसाए जा रहे इश्तहारों का असर तो पड़ता ही है। जैसे झूठ को रोज-रोज कहने-सुनने पर वह भी सच लगाने लगता है। इन्हीं उत्पादों में एक है "सैनेटाइज़र", जिसको साबुन-पानी का पर्याय मान कर, हर जगह, बिना उसके दुष्प्रभावों को जाने, खुलेआम घर-बाहर-स्कूल-कार्यक्षेत्र व अन्य जगहों में होने लगा है। इसका एक दूसरा कारण इसको आसानी से अपने साथ रख लाना ले जा सकना भी है। धीरे-धीरे यह आधुनिकता की निशानी बन फैशन में शुमार हो गया है। जिस तरह साधारण पानी की जगह "मिनिरल वाटर" ने ले ली है उसी तरह साबुन-पानी की जगह अब  "सैनिटाइजर" स्टेटस सिंबल बन कर छा गया है।   

इस यात्रा पर भी सदा की तरह "कानूनी भाई" सपरिवार साथ थे। यात्रा के और धर्मस्थान में रहने के दौरान कई बार हाथ वगैरह को साफ़ करने की जब भी जरुरत महसूस होती, पानी-साबुन की उपलब्धता के बावजूद उन्हें "सैनिटाइजर" का इस्तेमाल करते पाया। एक-दो बार टोका भी कि बार-बार केमिकल का प्रयोग ठीक नहीं रहता, पर उनके दिलो-दिमाग में इश्तहारों ने ऐसा घर बना लिया था कि अब उन्हें साबुन वगैरह का उपयोग असुरक्षित और पिछड़ेपन की निशानी
जबकि आज वैज्ञानिक और डॉक्टर भी इसके कम से कम इस्तेमाल की सलाह देने लगे हैं। 

यूनिवर्सिटी ऑफ मिसोरी, कोलंबिया ने अपनी खोज से सिद्ध किया है कि इसके ज्यादा इस्तेमाल से हाथों पर रहने वाले अच्छे बैक्टेरिया के खत्म होने के साथ-साथ हमारी एंटीबायोटिक अवरोध की क्षमता के कम होने की आशंका भी बढ़ जाती है। शोधों से यह भी सामने आया है कि सैनेटाइजर के ज्यादा उपयोग से खतरनाक रसायनों को शरीर अवशोषित करने लगता है जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। कई बार तो इसके तत्व यूरीन और खून के सैम्पल में भी दिखाई पड़ने लगे हैं।  खासकर बच्चों को इसका कम से कम उपयोग करना चाहिए। वैसे भी अधिकतर सैनेटाइजर में अल्कोहल सिर्फ 60% ही होता है जो जीवाणुओं के खात्मे के लिए पर्याप्त नहीं होता।  इसका उत्तम विकल्प साबुन और पानी ही है। 

इसका उपयोग न करने की सलाह के कुछ और भी कारण बताए गए हैं, जैसे इसके ज्यादा उपयोग से त्वचा को नुक्सान होता है। इसमें "ट्राइक्लोसन" और "विस्फेनोल" जैसे  हानिकारक और विषैले केमिकल मिले होते हैं। जो तरह-तरह की बीमारियों को तो न्यौता देते ही हैं हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कम कर देते हैं।       अमेरिका के Epidemic Intelligence Service द्वारा की गयी पड़तालों से भी यह सच सामने आया है कि इसके दिन में छह-सात बार के इस्तेमाल से हाथों पर  "नोरोवायरस" के पनपने का खतरा उत्पन्न हो जाता है जो हमारे पेट की जटिल बीमारियों का जरिया बनते हैं।     


अब तो U.S. Food and Drug Administration ने भी सैनेटाइजर बनाने वाली कंपनियों से पूरा शोध करने को कहा है जिससे इसका प्रयोग निरापद हो सके। वैसे भी इसको प्रयोग में लाने वाले करोड़ों लोग इसे जादुई चिराग ही समझते हैं जिसके छूने भर से बैक्टेरिया का सफाया हो जाता है। जबकि ऐसा नहीं है, जिस तरह साबुन ग्रीस, चिकनाई, मिटटी इत्यादि को साफ़ करता है उस तरह से सैनेटाइजर काम नहीं कर पाता। ज्यादातरकीटाणु उँगलियों के बीच, नाखूनों के अंदर, पोरों में छिपे होते हैं जिन्हें साफ़ करने के लिए हाथों को कम से कम बीस से तीस सेकेण्ड तक धोना बहुत जरुरी होता है। साबुन से धोने के बाद हाथों को ठीक से सूखा लेना चाहिए। वैसे ही यदि सैनेटाइजर का उपयोग करना ही पड़े तो उसके केमिकल को ठीक से वाष्पीकृत होने देना चाहिए और इसके उपयोग के कुछ देर बाद ही भोजन को छूना चाहिए। फिर भी कोशिश यही रहनी चाहिए कि इसका कम से कम ही प्रयोग हो। साबुन-पानी पर खुद और दूसरों का विश्वास बनाए रखने की कोशिश जरूर होनी चाहिए।
-- गगन शर्मा

Wednesday, May 10, 2017

सिद्धार्थ बुद्ध हो गए....निधि सक्सेना











सिद्धार्थ बुद्ध हो गए हैं
उन्होंने खोज लिया है जीवन का सत्य
दुख के कारण
सुख के उपाय
पाप और पुण्य के हेतु
और शांति के मार्ग..

कुछ विचलित हैं यशोधरा
जब से सुना है कि सिद्धार्थ ने ज्ञान पा लिया है
सब उनके अनुगामी हो रहे हैं
अनुयायी बढ़ते जा रहे हैं..

वे जानना चाहती है
कि बुद्ध ने कौन सा रहस्य खोजा है
एक बार पुनः भेंट करना चाहती हैं
शर्त इतनी सी कि बुद्ध खुद आयें उनके द्वार..
बुद्ध ने अनुरोध ठुकराया नहीं
कक्ष में पहुँचे हैं..

यशोधरा ने उनके हाथों को स्पर्श किया
कोमल हाथ अब खुरदुरे हो चले हैं
दोनों हाथों को अपने हाथ में ले 
शीश से लगाया
आसन दिया
और प्रश्न किया
क्या खोजा सिद्धार्थ
दुःसह तप कर के
भिक्षु बन के..
बुद्ध बता रहे हैं
भूख स्वाभाविक है
परंतु इसके लिए लोभ दुःख है
दूसरों पर हिंसा पाप है
हिंसा का मूल कारण भय है
और भय का मूल स्वार्थ
व्यक्ति स्वार्थ त्याग दे तो पाप का शमन निश्चित है
संयम ही सुख है
कांक्षाओं का नाश ही मोक्ष है
बुद्ध होना अभय होना है..

बुद्ध कहे जा रहे हैं
मानो आज अपने ज्ञान से वे 
उन्हें त्यागने का कलंक धो डालना चाहते हैं
मानो अपने ज्ञान के प्रकाश से वे 
उस अँधकार को उजाले से भर देना चाहते हैं
जिसमें वे उन्हें एकाकी छोड़ गए थे..
यशोधरा सुन रही हैं
सुनते सुनते अचानक यशोधरा मुस्कुराने लगी हैं
फिर जोरों से हंसने लगी
बुद्ध अचकचा गए
प्रश्नवाचक दृष्टि से उन्हें देखा
यशोधरा कह रही हैं
सिद्धार्थ क्या इसी ज्ञान के लिए तुमने मुझे तजा
छः वर्ष भटकते रहे वन में
भिक्षा की गुहार लगाते रहे
दारुण यातनाएँ सहते रहे
साधना तप उपवास किये..

ओह सिद्धार्थ
मुझसे विमर्श किया होता
वाद विवाद किया होता
पूछा होता
मैं कहती 
बताती
कि ये सहज स्वाभाविक समर्पण है
नया कुछ नहीं..
परंतु तुम तो मुँह फेर कर चले गए 
कदाचित् मुझे लधु और हीन जाना
अपनी साधना में बाधा जाना...

सिद्धार्थ अवाक् हैं
अहम् का एक कण उस तेजस्वी काया में शेष था अभी
वही आँखो से यशोधरा से पग पर टपक पड़ा..
बिना कुछ कहे उठ कर चल दिए 
अब वो पूर्ण बुद्ध हुए..
-निधि सक्सेना

आज भगवान बुद्ध जयन्ती पर विशेष रचना