Thursday, August 3, 2017

बहुत साफ है मन का आईना......हिन्दी साहित्य मंच से


एक सिलसिला सा चल रहा है
दिल आंसुओं में गल रहा है

कभी झांककर देखा अपने अंदर
हर तरफ वहां कुछ जल रहा है

आग लगी है रूह के धागे में
जिस्म मोम सा पिघल रहा है

बहुत साफ है मन का आईना
आंसुओं से जब वो धुल रहा है
......हिन्दी साहित्य मंच से

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (04-08-2017) को "राखी के ये तार" (चर्चा अंक 2686) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुंदर और भावपूर्ण लिखा आपने आदरणीय ------------- बहुत उम्दा ----------- शुभकामना

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